पेट्रोल-डीजल का जोरदार झटका; ₹3 प्रति लीटर बढ़े दाम, क्या अब ₹300 पार जाएगी कीमत?
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने से भारत में ईंधन की कीमतों में इजाफा हुआ है।

वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के बढ़ते ग्राफ और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उछाल को दर्शाता एक ग्राफिकल चित्रण
Fuel price hike India : अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने पूरी दुनिया को एक गंभीर ऊर्जा संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। पश्चिम एशिया में छिड़ी इस जंग की तपिश अब भारतीय रसोई और आम आदमी की जेब तक पहुंच गई है। शुक्रवार, 15 मई को देशभर में ईंधन की कीमतों में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसने मिडिल क्लास की आर्थिक गणित को बिगाड़ दिया है। राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमतों में 3.14 रुपये प्रति लीटर का इजाफा हुआ है, जिसके बाद अब एक लीटर पेट्रोल के लिए लोगों को 97.77 रुपये चुकाने होंगे। वहीं, डीजल भी 3.11 रुपये महंगा होकर 90.67 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर पहुंच गया है। केवल पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि मध्य पूर्व के संकट ने सीएनजी की कीमतों को भी प्रभावित किया है, जिसमें 2 रुपये प्रति किलोग्राम की वृद्धि के साथ अब नई दरें 79.09 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई हैं।
इस महंगाई के पीछे की कहानी बेहद चौंकाने वाली है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने के बावजूद सरकार ने आम जनता को एक बहुत बड़ी मार से बचा लिया है। वर्तमान में तेल कंपनियां प्रतिदिन लगभग एक हजार करोड़ रुपये का भारी घाटा खुद सह रही हैं। यदि सरकार टैक्स में कटौती नहीं करती और तेल कंपनियां पेट्रोल पर 26 रुपये तथा डीजल पर 82 रुपये प्रति लीटर की अंडर-रिकवरी खुद वहन नहीं करतीं, तो भारत में ईंधन की कीमतें आज के मुकाबले दो से तीन गुना अधिक होतीं। सरकार पहले ही पेट्रोल पर 8 रुपये और डीजल पर 6 रुपये उत्पाद शुल्क घटा चुकी है, अन्यथा देश का परिवहन तंत्र, किसान और ट्रक चालक पूरी तरह से आर्थिक दबाव में टूट जाते।
वैश्विक परिदृश्य की तुलना में भारत की स्थिति अब भी संभली हुई नजर आती है। जहां दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में तेल की कीमतें 50 प्रतिशत तक और यूरोप में 20 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं, वहीं भारत ने अब तक राशनिंग जैसी नौबत नहीं आने दी है। दुनिया के करीब 82 देशों में इस समय तेल की भारी किल्लत है और वहां इसे सीमित मात्रा में दिया जा रहा है। कृषि क्षेत्र को राहत देने के लिए सरकार खाद पर भी भारी सब्सिडी दे रही है, जहां बाजार में 2200 रुपये में मिलने वाली खाद की बोरी किसान को मात्र 242 रुपये में उपलब्ध कराई जा रही है। यह अंतर पूरी तरह से सरकारी खजाने से भरा जा रहा है ताकि खाद्य सुरक्षा पर कोई आंच न आए।
इस अभूतपूर्व संकट के बीच प्रधानमंत्री ने देशवासियों से एक विशेष अपील की है। सरकार का मानना है कि यह मुसीबत पूरी तरह से बाहरी परिस्थितियों की देन है और भारत किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर फैसले नहीं ले रहा है। प्रधानमंत्री ने नागरिकों से ईंधन बचाने, अनावश्यक विदेश यात्राओं को टालने और सोने के आयात को कम करने का आग्रह किया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारतीय परिवारों के पास लगभग 30 हजार टन सोना जमा है, जिसकी बाजार कीमत करीब 400 लाख करोड़ रुपये है। सोने का बढ़ता आयात अब देश का दूसरा सबसे बड़ा खर्च बन चुका है, जो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डाल रहा है। यह लेख स्पष्ट करता है कि आगामी कुछ समय तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, जो सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेगा।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
