कई दशकों से अर्थशास्त्री यह कहते आ रहे हैं कि भारत रोजगार के मामले में एशिया की बड़ी दौड़ में पीछे छूट गया है। जहां बांग्लादेश ने लाखों गारमेंट नौकरियां पैदा कीं, और चीन ने करोड़ों फैक्ट्री जॉब्स तैयार कीं, वहीं भारत ने बड़ी संख्या में सॉफ्टवेयर इंजीनियर तो तैयार किए, लेकिन कम पढ़े-लिखे युवाओं के लिए पर्याप्त अच्छी नौकरियां पैदा करने में संघर्ष करता रहा। फिर एक ऐसा दौर आया जब भारत में रोजगार की एक बिल्कुल नई और अनोखी क्रांति चुपचाप शुरू हुई। यह क्रांति किसी श्रम-प्रधान कारखाने या सरकारी सब्सिडी के दम पर नहीं, बल्कि स्मार्टफोन और डिजिटल तकनीक के प्रसार से आई। कुछ साल पहले तक भारत में गिग वर्कर्स की संख्या लगभग नगण्य थी, लेकिन आज यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 1.2 करोड़ तक पहुंच चुका है। अनुमान यह भी लगाया जा रहा है कि साल 2030 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 2.35 करोड़ तक जा सकती है, जो भारत के गैर-कृषि क्षेत्र के कुल कामगारों का करीब 6.7 प्रतिशत हिस्सा होगी।

हालांकि, अब यही तेजी से बदलती तकनीक इन लाखों गिग वर्कर्स के रोजगार के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हो रही है। ड्रोन और ड्राइवरलेस वाहन यानी रोबोटैक्सी पश्चिमी देशों और चीन में तेजी से अपनी पैठ बना रहे हैं। इनसे आर्थिक उत्पादकता में भारी सुधार होने की उम्मीद की जा रही है। ऐसी स्थिति में कुछ समूह और संगठन इन नई तकनीकों पर रोक लगाने या प्रतिबंध की मांग कर सकते हैं। लेकिन इस पूरी समस्या का स्थायी और व्यावहारिक समाधान तकनीक को रोकना बिल्कुल नहीं है, बल्कि इस बड़े बदलाव के दौर को बेहद संवेदनशीलता और बुद्धिमत्ता के साथ संभालना है।

हाल ही में आई 2026 की एक स्टडी के अनुसार, भारत में प्लेटफॉर्म ड्राइवरों की औसत सकल कमाई लगभग 27,000 रुपये प्रति माह है और सभी प्रकार के खर्चे निकालने के बाद उनके पास करीब 19,000 रुपये की बचत बचती है। यह कमाई उनके लिए उपलब्ध कई अन्य पारंपरिक रोजगार विकल्पों की तुलना में काफी बेहतर है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण यानी PLFS के आंकड़ों पर नजर डालें तो कैजुअल वर्कर्स औसतन 418 रुपये प्रतिदिन कमाते हैं। यदि महीने में 26 दिन काम किया जाए तो यह राशि लगभग 10,868 रुपये बैठती है। इसके अलावा, मनरेगा के कामगारों की औसत कमाई भी लगभग इतनी ही होती है। सेल्फ-एम्प्लॉयड यानी खुद का काम करने वाले वर्कर्स की औसत मासिक कमाई करीब 13,279 रुपये है। वहीं, जिस गारमेंट इंडस्ट्री को हमेशा से अर्थशास्त्री भारत के रोजगार संकट का एक बड़ा समाधान बताते आए हैं, वहां भी अलग-अलग राज्यों में मासिक वेतन लगभग 12,800 से 15,700 रुपये के बीच ही है। इसका मतलब साफ है कि फिलहाल के समय में गिग वर्क कई युवाओं और कामगारों के लिए ज्यादा कमाई देने वाला एक आकर्षक विकल्प बना हुआ है।

लेकिन अब सवाल यह उठता है कि आगे क्या होगा? मान लीजिए कि ब्लिंकिट का एक डिलीवरी राइडर शहर के भारी ट्रैफिक के बीच लगातार संघर्ष करते हुए 30 मिनट में टूथपेस्ट आपके घर तक पहुंचाता है। वहीं दूसरी ओर, एक आधुनिक ड्रोन संभावित रूप से इसी काम को महज 3 मिनट के भीतर पूरा कर सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में न तो पेट्रोल की खपत होगी, न ही किसी डिलीवरी राइडर की आवश्यकता पड़ेगी, न ट्रैफिक जाम की समस्या होगी, और न ही किसी दुर्घटना के मुआवजे या सोशल सिक्योरिटी योगदान की जरूरत महसूस होगी। यह केवल भविष्य की कोई काल्पनिक कथा नहीं है। अल्फाबेट की कंपनी 'विंग' अब तक एक मिलियन से अधिक यानी दस लाख से ज्यादा कमर्शियल ड्रोन डिलीवरी सफलतापूर्वक पूरी कर चुकी है। इसके अलावा, दुनिया के कई देशों में रोबोटैक्सी व्यावसायिक रूप से सड़कों पर दौड़ रही हैं। फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित हालिया रिसर्च के अनुसार, चीन के वुहान शहर में रोबोटैक्सी की सफल एंट्री के बाद वहां के पारंपरिक टैक्सी ड्राइवरों की आय में लगभग 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। अमेरिका में भी Waymo जैसी कंपनियां राइड-हेलिंग बाजार में अपनी उपस्थिति लगातार मजबूत कर रही हैं।

क्या इसके चलते भारत में गिग वर्कर्स की नौकरियां पूरी तरह से खत्म हो जाएंगी? इसका जवाब इतना आसान नहीं है। भारत की जटिल और अनूठी शहरी व्यवस्था फिलहाल गिग वर्कर्स को एक हद तक सुरक्षा प्रदान कर सकती है। भारत के शहरों में ट्रैफिक नियमों का पालन हमेशा एक ही तरीके से नहीं होता है। यहाँ वाहन अक्सर अलग-अलग दिशाओं से आते हैं और कई बार लोग ट्रैफिक सिग्नल की भी परवाह नहीं करते। ऐसी अव्यवस्थित और अनिश्चित स्थिति में पूरी तरह से ड्राइवरलेस वाहन भारी मुश्किल में पड़ सकते हैं। आज के ड्राइवरलेस वाहनों में अत्याधुनिक सेंसर लगे होते हैं, जो किसी भी तरह की टक्कर से बचने में मदद करते हैं। लेकिन जब सड़क पर चल रहे अन्य वाहन नियमों का पालन नहीं करते हैं, तो ड्राइवरलेस सिस्टम को पूरी तरह सुरक्षित रहने के लिए बार-बार रुककर इंतजार करना पड़ सकता है। भारत जैसे भारी ट्रैफिक वाले देश में इस स्थिति से सड़कों पर भयंकर जाम लग सकता है। यही बड़ी चुनौती भारत में ड्राइवरलेस वाहनों और ऑटोनॉमस तकनीक की एंट्री को काफी धीमा कर सकती है।

इसके अलावा, शहरी वास्तुकला भी एक बड़ा सवाल है। अमेरिका या अन्य पश्चिमी देशों में ड्रोन किसी घर के खुले लॉन में आसानी से किराना सामान या पैकेज ड्रॉप कर सकता है। लेकिन जरा सोचिए कि मुंबई की किसी ऊंची इमारत की 17वीं मंजिल पर रहने वाले ग्राहक तक पनीर टिक्का की डिलीवरी एक ड्रोन कैसे पहुंचाएगा? इसके अलावा, धारावी या पुरानी दिल्ली जैसी अत्यधिक घनी और संकरी गलियों में ड्रोन के लिए सुरक्षित लैंडिंग की जगह तलाशना भी बेहद कठिन काम होगा। यही कारण है कि भारत में जितने भी तकनीकी प्रयोग किए जा रहे हैं, उनमें ड्रोन को मुख्य रूप से 'मिडिल-माइल डिलीवरी' तक ही सीमित रखने की कल्पना की जा रही है। इसका मतलब यह होगा कि ड्रोन वेयरहाउस से किसी डार्क स्टोर या स्थानीय हब तक भारी मात्रा में सामान पहुंचाएगा, और अंतिम यानी 'लास्ट-माइल' डिलीवरी का काम हमेशा की तरह कोई इंसान ही करेगा।

फिर भी यह सोचना गलत होगा कि तकनीक का कोई असर नहीं पड़ेगा। मान लीजिए कि एक अकेला ड्रोन ऐसी डिलीवरी आसानी से कर देता है, जिसे पहले पांच गिग वर्कर्स मिलकर पूरा किया करते थे। इसका सीधा सा मतलब यह होगा कि चार लोगों की नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। लेकिन इसके साथ ही हमें यह भी देखना होगा कि डिलीवरी की कुल लागत और समय में भारी कमी आने से उपभोक्ताओं को सामान काफी सस्ता मिल सकेगा। कम कीमत मिलने का सीधा अर्थ है उपभोक्ताओं की प्रभावी आय में बढ़ोतरी होना। जब ग्राहकों के पास पैसे बचेंगे, तो वे अन्य चीजों पर ज्यादा खर्च करेंगे, जिससे अंततः पूरी अर्थव्यवस्था और अप्रत्यक्ष रूप से नए रोजगार के अवसरों को बढ़ावा मिलेगा। औद्योगिक क्रांति के शुरुआती दौर से ही यह नियम रहा है कि नई मशीनों ने पुराने कई रोजगारों को खत्म किया है, लेकिन साथ ही नए और बेहतर वेतन वाले रोजगार भी पैदा किए हैं। हालांकि, जिन विशेष लोगों की नौकरियां जाती हैं, उनके लिए यह संक्रमण काल बेहद दर्दनाक और कठिन होता है। इसलिए इस बदलाव के सामाजिक और आर्थिक असर को कम करने के पुख्ता उपाय करने बहुत जरूरी हैं।

यही वजह है कि भारत में कई राजनेता और नीति निर्माता रोजगार बचाने के नाम पर ड्रोन और रोबोटैक्सी जैसी तकनीकों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग कर सकते हैं। लेकिन किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए उत्पादकता बढ़ाने वाली तकनीक को रोकना लंबे समय में भारी नुकसानदेह साबित हो सकता है। गिग वर्कर्स की नौकरियां बचाने के लिए ड्रोन पर बैन लगाना उतना ही अतार्किक कदम होगा, जितना कि खादी उद्योग को बचाने के लिए आधुनिकीकृत स्पिनिंग मिलों पर रोक लगाना, गड्ढे खोदने वाले मजदूरों का रोजगार बचाने के लिए आधुनिक जेसीबी मशीनों पर प्रतिबंध लगाना, या फिर हाथ से फसल की कटाई करने वालों का रोजगार बचाने के लिए विशाल हार्वेस्टर मशीनों पर प्रतिबंध लगाना।

भारत में कंप्यूटराइजेशन के शुरुआती दौर में भी ऐसा ही कड़ा विरोध देखने को मिला था। 1990 के दशक की शुरुआत में देश की बैंक यूनियनों ने बैंकों के साथ एक ऐसा समझौता कराया था, जिसके तहत देश की बड़ी शाखाओं में कंप्यूटराइजेशन की प्रक्रिया को सालाना केवल 1 प्रतिशत और छोटी शाखाओं में मात्र 0.5 प्रतिशत तक ही सीमित कर दिया गया था। अगर उस सुस्त रफ्तार से काम लिया जाता तो पूरी भारतीय बैंकिंग व्यवस्था को कंप्यूटराइज होने में करीब 200 साल का लंबा समय लग जाता। हालांकि, बाद में स्थिति को समझा गया, एक बेहतर और प्रगतिशील नीति अपनाई गई, और तकनीक को आगे बढ़ने की पूरी छूट दी गई, जिससे आज देश का बैंकिंग सेक्टर दुनिया के सबसे आधुनिक सेक्टरों में गिना जाता है।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि ड्रोन का इस्तेमाल केवल पिज्जा या ग्रॉसरी डिलीवरी तक ही सीमित नहीं है। देश के विभिन्न हिस्सों में चलाए गए पायलट प्रोजेक्ट्स ने यह साफ दिखाया है कि ड्रोन दूरदराज के घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में जीवन रक्षक मेडिकल सामान और दवाइयों को पारंपरिक साधनों से लगने वाले कई घंटों के बजाय मात्र कुछ ही मिनटों में पहुंचा सकते हैं। ऐसे में यदि केवल डर की वजह से ड्रोन पर प्रतिबंध लगा दिया जाए, तो कई गंभीर मरीजों की जान खतरे में पड़ सकती है और साथ ही देश के पहाड़ी तथा दूरदराज के इलाकों के समग्र विकास पर भी इसका बहुत बुरा असर पड़ सकता है।

ऐसी स्थिति में सरकार की असली और मुख्य भूमिका तकनीक के रथ को रोकने की बिल्कुल नहीं होनी चाहिए, बल्कि तकनीकी बदलाव से सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले कामगारों को मजबूत सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने और उन्हें नए युग के रोजगार के लिए तैयार करने की होनी चाहिए। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन इतनी तेजी से और इतने बड़े पैमाने पर बदल रहे हैं कि आज यह निश्चित तौर पर भविष्यवाणी करना बेहद कठिन है कि भविष्य में किस तरह की नौकरियां और भूमिकाएं अस्तित्व में होंगी। लेकिन यह पूरी तरह तय है कि बड़े पैमाने पर री-स्किलिंग और री-ट्रेनिंग की जरूरत जरूर पड़ेगी। इसके लिए यह उपाय किया जा सकता है कि AI और नई तकनीकों से बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को होने वाले अतिरिक्त और भारी-भरकम मुनाफे पर विशेष टैक्स लगाया जाए, और उससे मिलने वाले राजस्व का इस्तेमाल श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा और उनकी उन्नत ट्रेनिंग के लिए एक समर्पित फंड तैयार करने में किया जाए, ताकि देश का हर कामगार इस बदलाव में पीछे न छूटे।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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