देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में बचत खातों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हालिया सरकारी आंकड़ों से खुलासा हुआ है कि वित्त वर्ष 2020 से 2024 के बीच भारतीय बैंकों ने न्यूनतम बैलेंस न रखने पर खाताधारकों से कुल ₹8,494.82 करोड़ की राशि जुर्माने के रूप में वसूली। यह आंकड़ा न केवल बैंकिंग प्रणाली की नीतियों पर सवाल खड़े करता है, बल्कि उन करोड़ों खाताधारकों की स्थिति को भी उजागर करता है जिनके लिए बचत खाता आज भी वित्तीय सुरक्षा का सबसे बुनियादी साधन है।

सरकारी जानकारी के अनुसार, इस अवधि में 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को छोड़कर तिमाही औसत बैलेंस (Quarterly Average Balance) बनाए न रखने वाले ग्राहकों से यह राशि वसूली। इनमें वित्त वर्ष 2024 में सबसे अधिक जुर्माना वसूलने वाला बैंक पंजाब नेशनल बैंक (PNB) रहा, जिसने अकेले ₹633 करोड़ की वसूली की। आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि कोविड-19 महामारी के दौरान दी गई अस्थायी राहत और छूट के बावजूद, इन जुर्मानों से होने वाली आय में लगभग 34 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

न्यूनतम बैलेंस की यह व्यवस्था लंबे समय से विवाद का विषय बनी हुई है। बैंकिंग नियमों के अनुसार, यदि बचत खाते में निर्धारित सीमा से कम राशि रहती है तो खाताधारक से शुल्क वसूला जाता है, जिसे बैंक सेवा शुल्क के रूप में दर्शाते हैं। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि यह व्यवस्था विशेष रूप से निम्न आय वर्ग और ग्रामीण क्षेत्रों के खाताधारकों पर असमान आर्थिक दबाव डालती है, जबकि ऐसे खातों का मूल उद्देश्य छोटी बचत को प्रोत्साहित करना और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना होता है।

सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि देश में ऐसे विकल्प मौजूद हैं जिनमें न्यूनतम बैलेंस की अनिवार्यता नहीं है। प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत खुले लगभग 53 करोड़ खाते पूरी तरह शून्य बैलेंस पर संचालित किए जा सकते हैं और इनमें किसी तरह का जुर्माना नहीं लिया जाता। इसके बावजूद, बड़ी संख्या में लोग सामान्य बचत खाते रखते हैं, जिनमें न्यूनतम बैलेंस नियम लागू होते हैं और नियमों की पूरी जानकारी न होने के कारण उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का तर्क है कि न्यूनतम बैलेंस नियम और उससे जुड़े शुल्क पहले से घोषित शर्तों का हिस्सा होते हैं। उनके अनुसार, खाताधारकों को खाता खोलते समय इन नियमों की जानकारी दी जाती है और शुल्क बैंकिंग सेवाओं के संचालन की लागत को पूरा करने के लिए आवश्यक है। वहीं दूसरी ओर, उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि शर्तों की भाषा जटिल होती है और आम ग्राहक को इसके प्रभाव का अंदाजा तब लगता है, जब खाते से राशि कट चुकी होती है।

इन आलोचनाओं और सार्वजनिक दबाव के बीच कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने नीतिगत बदलाव भी किए हैं। भारतीय बैंक और केनरा बैंक जैसे कई पीएसबी ने न्यूनतम बैलेंस न रखने पर लगने वाले जुर्माने को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इसे उपभोक्ता हित में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है, हालांकि अधिकांश बैंक अभी भी इस व्यवस्था को जारी रखे हुए हैं।

पांच वर्षों में वसूली गई यह भारी राशि यह संकेत देती है कि बैंकिंग नीतियों और वित्तीय समावेशन के लक्ष्यों के बीच संतुलन अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। न्यूनतम बैलेंस जुर्माने से जुड़े ये आंकड़े न केवल बैंकों की आय संरचना को उजागर करते हैं, बल्कि यह सवाल भी छोड़ जाते हैं कि क्या भविष्य में बैंकिंग प्रणाली आम खाताधारक के लिए अधिक संवेदनशील और पारदर्शी बन पाएगी।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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