नई दिल्ली: साल 2026 की दहलीज पर खड़ा भारत एक ऐसे आर्थिक मोड़ पर है जहाँ राहत की उम्मीदें और अनिश्चितता के बादल एक साथ मँडरा रहे हैं। पिछले एक साल में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा रेपो रेट में की गई भारी कटौती ने मध्यम वर्ग को बड़ी राहत दी है, लेकिन वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल और घरेलू बाजार में बढ़ती कुछ कीमतों ने आम आदमी की चिंताएं फिर से बढ़ा दी हैं। यह साल न केवल मौद्रिक नीति में बदलाव का गवाह बनेगा, बल्कि महंगाई मापने के पुराने पैमानों में भी एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलेगा।

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल ही में देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति को एक "रेयर गोल्डिलॉक्स पीरियड" (Rare Goldilocks Period) करार दिया है। उनके अनुसार, यह एक ऐसा दौर है जहाँ विकास दर मजबूत है और महंगाई नियंत्रण में बनी हुई है। दिसंबर 2025 की मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद रेपो रेट को 5.25% पर लाया गया, जो पिछले एक साल में कुल 125 बेसिस पॉइंट्स की कटौती का परिणाम है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस नीति का सबसे बड़ा लाभ होम लोन और ऑटो लोन लेने वाले उन करोड़ों भारतीयों को मिलेगा, जिनकी ईएमआई (EMI) अब धीरे-धीरे कम होने लगी है।

हालांकि, साल के पहले दिन से ही आम आदमी की रसोई पर महंगाई का वार भी शुरू हो गया है। कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में 111 रुपये की बढ़ोतरी ने बाजार में बिकने वाले खाने-पीने के सामान को महंगा कर दिया है। इसके साथ ही, ट्रेन टिकटों के किराए में प्रति किलोमीटर की मामूली वृद्धि और कार कंपनियों द्वारा इनपुट लागत का हवाला देकर बढ़ाई गई कीमतों ने मध्यम वर्ग की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाला है। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर में खुदरा महंगाई दर 1.66% तक पहुंचने का अनुमान है, जो नवंबर के 0.71% के मुकाबले थोड़ी अधिक है।

आर्थिक विशेषज्ञों की राय इस साल को लेकर विभाजित है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का कहना है कि 2026 का सबसे महत्वपूर्ण पहलू महंगाई मापने वाले नए इंडेक्स (CPI Index) का आना होगा, जिसका आधार वर्ष 2024 तय किया गया है। वहीं, क्रिसिल (CRISIL) के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी और इंडिया रेटिंग्स के देवेंद्र कुमार पंत ने चेतावनी दी है कि यदि मानसून सामान्य नहीं रहा या वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में उछाल आया, तो महंगाई दर फिर से 4% से ऊपर जा सकती है। इसके विपरीत, यूनियन बैंक और आईआईएफएल (IIFL) कैपिटल के विश्लेषकों को उम्मीद है कि फरवरी या अप्रैल 2026 की बैठक में ब्याज दरों में एक आखिरी 25 बेसिस पॉइंट्स की कटौती हो सकती है, जिससे रेपो रेट 5% के स्तर पर आ जाएगा।

इस आर्थिक चक्र का सबसे गहरा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जो अपनी बचत और लोन की किस्तों के बीच तालमेल बिठा रहे हैं। जहाँ एक तरफ एफडी (FD) दरों में गिरावट से बुजुर्गों की आय कम हुई है, वहीं दूसरी तरफ लोन सस्ता होने से नए घर खरीदने वालों के लिए अवसर खुले हैं। वीएसआरके (VSRK) कैपिटल के डायरेक्टर स्वप्निल अग्रवाल के अनुसार, अब बैंकों को ब्याज दरों में कटौती का पूरा लाभ ग्राहकों तक पहुंचाना होगा। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और रिजर्व बैंक मिलकर किस तरह विकास की रफ्तार को बनाए रखते हुए आम आदमी की जेब को महंगाई की तपिश से बचाते हैं।

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