Budget 2026: उम्मीदों का महल ढहा, आम आदमी से चुनावी राज्यों तक हाथ लगी सिर्फ निराशा
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण ने आम आदमी और चुनावी राज्यों की उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है। इनकम टैक्स स्लैब में बदलाव न होने, किसानों की निधि न बढ़ने और चुनावी राज्यों को विशेष पैकेज न मिलने से जनता में निराशा है। जानिए उन 5 बड़ी घोषणाओं के बारे में जो इस बार बजट से गायब रहीं और इसका मध्यम वर्ग पर क्या असर पड़ेगा।

Election States Budget Package : 1 फरवरी की सुबह जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में बजट पेश करने के लिए खड़ी हुईं, तो देश के करोड़ों लोगों की निगाहें टीवी स्क्रीन पर टिकी थीं। मध्यम वर्ग से लेकर अन्नदाता तक और युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई एक बड़ी 'सौगात' की हसरत पाले बैठा था। विशेषकर उन पांच राज्यों के मतदाता, जहाँ आने वाले समय में विधानसभा चुनाव होने हैं, उन्हें लगा था कि सरकार खजाना खोल देगी। लेकिन जैसे-जैसे बजट भाषण आगे बढ़ा, उम्मीदों का यह महल ताश के पत्तों की तरह ढह गया। बजट खत्म होते-होते यह साफ हो गया कि इस बार सरकार ने लोकलुभावन घोषणाओं के बजाय अनुशासन को तरजीह दी है, जिससे आम आदमी को 'जोर का झटका' लगा है।
इस बजट में वो पांच मोर्चे कौन से रहे, जहाँ जनता की उम्मीदें पूरी तरह टूट गईं, आइए विस्तार से समझते हैं:
1. टैक्स स्लैब: मध्यम वर्ग की उम्मीदों पर तुषारापात
पिछले बजट में इनकम टैक्स की सीमा 12 लाख रुपये तक किए जाने के बाद करदाताओं को पूरी उम्मीद थी कि इस बार यह आंकड़ा 13 या 14 लाख रुपये तक पहुँचेगा। मिडिल क्लास को न्यू टैक्स रिजीम में बड़े बदलावों और PPF, NPS या ELSS जैसे निवेशों पर अतिरिक्त छूट की आस थी। लेकिन वित्त मंत्री ने अपने भाषण में इनकम टैक्स का जिक्र तक नहीं किया, जिससे नौकरीपेशा वर्ग में भारी मायूसी देखी जा रही है।
2. अन्नदाता की झोली रही खाली :
किसानों को उम्मीद थी कि 'प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि' की राशि, जो पिछले 6 वर्षों से स्थिर है, उसमें इस बार बढ़ोतरी होगी। इसके अलावा, एमएसपी (MSP) के दायरे में नई फसलों को लाने और खाद-बीज पर सब्सिडी बढ़ाने जैसी मांगों पर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। कर्ज माफी की आस लगाए बैठे किसानों के लिए भी यह बजट किसी सूखे जैसा ही रहा।
3. युवाओं के लिए रोजगार की कोई 'जादुई' योजना नहीं :
बेरोजगारी के मुद्दे पर युवाओं की नजरें किसी बड़ी और सीधी रोजगार योजना पर थीं। हालांकि, सरकार ने डेटा सेंटर, स्कूलों में कंटेंट क्रिएशन और इंटर्नशिप के जरिए अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन की बात कही, लेकिन वर्तमान बेरोजगारों को तुरंत राहत देने वाली किसी 'मेगा स्कीम' का अभाव दिखा।
4. सीनियर सिटीजन: रेलवे रियायत का इंतजार बढ़ा
बुजुर्गों को इस बार उम्मीद थी कि कोरोना काल में बंद हुई रेलवे टिकटों में छूट फिर से बहाल होगी या उनके लिए कोई विशेष स्वास्थ्य बीमा योजना आएगी। टीडीएस (TDS) कटौती के नियमों में भी कोई बदलाव न होने से वरिष्ठ नागरिकों को निराशा हाथ लगी है।
5. चुनावी राज्यों को नहीं मिला 'बिहार जैसा' विशेष पैकेज :
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी जैसे चुनावी राज्यों के लिए किसी 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' या विशेष आर्थिक पैकेज की उम्मीद थी। हालांकि, सिलीगुड़ी को रेलवे कॉरिडोर और तमिलनाडु को 'रेयर अर्थ कॉरिडोर' में शामिल करने जैसी कुछ घोषणाएं हुईं, लेकिन वे बिहार को मिले पिछले पैकेज की तुलना में काफी फीकी रहीं।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
