IBC amendment 2025 loan recovery impact : भारत की बैंकिंग और कॉरपोरेट वित्तीय व्यवस्था में निर्णायक बदलाव की दिशा में एक अहम कदम बढ़ाया गया है। दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) विधेयक, 2025 में प्रस्तावित संशोधनों से बैंकों और अन्य कर्जदाताओं को लंबे समय से जूझ रही कर्ज वसूली की समस्या से राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। मौजूदा व्यवस्था में मामलों के निपटारे में हो रही देरी को देखते हुए सरकार और नियामक संस्थाएं अब सिस्टम को अधिक प्रभावी और समयबद्ध बनाने की तैयारी में हैं।

सोमवार को जारी रेटिंग एजेंसी आईसीआरए की रिपोर्ट में कहा गया है कि आईबीसी 2025 में कई अहम बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं, जिनमें समूह दिवालिया प्रक्रिया, सीमा पार दिवालिया मामलों की व्यवस्था और कर्जदाताओं द्वारा दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। इन सुधारों का उद्देश्य जटिल मामलों को तेजी से सुलझाना और कानूनी अड़चनों को कम करना है, ताकि बैंकों को फंसी हुई रकम समय पर वापस मिल सके।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) और एनसीएलएटी में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ प्रक्रियात्मक सुधारों से न्यायिक संस्थानों पर बढ़ते बोझ को कम किया जा सकेगा। आईसीआरए के अनुसार, संसद में पेश किए गए आईबीसी संशोधन विधेयक और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय तथा भारतीय दिवालियापन और दिवाला बोर्ड के सुझाव कर्ज वसूली की प्रक्रिया को अधिक कुशल बना सकते हैं। हालांकि, ये प्रस्तावित सुधार फिलहाल रियल एस्टेट सेक्टर पर लागू नहीं होंगे।

आईसीआरए ने अपनी रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया है कि रियल एस्टेट और निर्माण क्षेत्र में बड़ी संख्या में दिवालिया मामले लंबित हैं, लेकिन इस सेक्टर के लिए अलग से कोई ठोस सुधार प्रस्तावित नहीं किया गया है। एजेंसी का मानना है कि घर खरीदारों के हितों की रक्षा और अधूरी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए रियल एस्टेट क्षेत्र में विशेष सुधारों की आवश्यकता बनी हुई है।

अक्टूबर 2025 में आईबीसी कानून को लागू हुए नौ साल पूरे हो गए। इस अवधि में इस कानून के तहत करीब चार लाख करोड़ रुपये की वसूली की जा चुकी है, जो अन्य वसूली तंत्रों की तुलना में बेहतर मानी जाती है। सितंबर 2025 तक कुल 8,658 कंपनियों के मामले आईबीसी के तहत आए, जिनमें से लगभग 63 प्रतिशत मामलों का निपटारा हो चुका है। इसके बावजूद, बैंकों को कई मामलों में भारी नुकसान उठाना पड़ा और औसतन केवल 32 प्रतिशत राशि ही वापस मिल पाई। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए अगस्त 2025 में आईबीसी का सातवां संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया गया।

आईसीआरए की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट मनुश्री सागर ने कहा कि मार्च 2025 तक कर्ज वसूली में सुधार के संकेत मिले थे, लेकिन 2026 की पहली छमाही में इसमें फिर गिरावट देखी गई। रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2025 तक चल रहे लगभग 75 प्रतिशत मामलों में 270 दिनों से अधिक समय लग चुका है। वर्तमान में एनसीएलटी में 30,000 से ज्यादा मामले लंबित हैं और मौजूदा क्षमता के आधार पर इनके निपटारे में 10 साल से अधिक का समय लग सकता है। हालांकि, सरकार एनसीएलटी और एनसीएलएटी की बेंच बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है, जिससे भविष्य में मामलों के निपटारे की रफ्तार बढ़ने की संभावना है। फिलहाल, आईबीसी के तहत मामलों के समाधान में औसतन 700 दिन लग रहे हैं, जबकि तय समय सीमा 330 दिन की है।

आईबीसी विधेयक, 2025 में प्रस्तावित ये बदलाव न केवल बैंकों की बैलेंस शीट को मजबूत करने की दिशा में अहम साबित हो सकते हैं, बल्कि भारत की दिवाला समाधान प्रक्रिया को अधिक भरोसेमंद और समयबद्ध बनाकर निवेशकों का विश्वास भी बढ़ा सकते हैं।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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