नई दिल्ली: वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था एक बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रही है। इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में देश के चालू खाता घाटे (करंट अकाउंट डेफिसिट) को नियंत्रित करने के लिए सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों पर देश के शीर्ष अर्थशास्त्रियों ने मंथन शुरू कर दिया है। इसी क्रम में नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और वर्तमान वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने सरकार द्वारा सोने पर आयात शुल्क बढ़ाने के हालिया फैसले पर गंभीर असहमति जताई है। उनका स्पष्ट मानना है कि किसी एक विशिष्ट वस्तु को लक्षित कर आर्थिक संतुलन बनाने का प्रयास दीर्घकालिक रूप से बेअसर साबित हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। सरकार ने इस दबाव को कम करने और गैर-जरूरी आयात को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से हाल ही में सोने और चांदी के आभूषणों पर आयात शुल्क में पांच प्रतिशत, जबकि प्लैटिनम पर 5.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। आंकड़े बताते हैं कि भारत का सोने का आयात पहले ही रिकॉर्ड 72 अरब डॉलर के स्तर को छू चुका है। हालांकि, पनगढ़िया ने इस प्रशासनिक कदम की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए हैं। उनका तर्क है कि आयात शुल्क बढ़ाने से सोने की वैध आवक तो कम हो सकती है, लेकिन इसका एक दूसरा स्याह पहलू यह भी है कि इससे बाजार में सोने की तस्करी और अनौपचारिक व्यापार को अप्रत्याशित बढ़ावा मिल सकता है।

जाने-माने अर्थशास्त्री ने इस समस्या का एक वैकल्पिक और बाजार-आधारित नीतिगत समाधान सुझाया है। उनका कहना है कि विदेशी मुद्रा के इस संकट से निपटने के लिए भारतीय रुपये को बाजार के रुख के अनुसार स्वाभाविक रूप से कमजोर होने देना चाहिए। जब रुपया कमजोर होगा, तो विदेशों से आयात होने वाली तमाम वस्तुएं घरेलू बाजार में स्वतः ही महंगी हो जाएंगी, जिससे उनकी मांग में प्राकृतिक कमी आएगी। इसके साथ ही, कमजोर रुपये के कारण भारतीय निर्यात वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी और आकर्षक हो जाएगा, जो अंततः देश के व्यापार संतुलन को सुधारने में मदद करेगा। पनगढ़िया के अनुसार, किसी एक कमोडिटी को चुनकर उस पर प्रशासनिक पाबंदियां लगाने से पूरी आर्थिक समायोजन प्रक्रिया बाधित होती है।

इस आर्थिक विमर्श के बीच, अरविंद पनगढ़िया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश की जनता से ईंधन बचाने और अपने व्यवहार में बदलाव लाने की अपीलों का पुरजोर समर्थन किया है। प्रधानमंत्री ने नागरिकों से गैर-जरूरी यात्राओं से बचने, ईंधन की खपत कम करने और कंपनियों से 'वर्क फ्रॉम होम' व्यवस्था को बढ़ावा देने का आग्रह किया था। पनगढ़िया ने इस मुहिम की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा 1965 के खाद्यान्न संकट के दौरान देशवासियों से हफ्ते में एक दिन उपवास रखने की ऐतिहासिक अपील से की। उन्होंने इस प्रकार के 'नैतिक दबाव' को पूरी तरह से स्वैच्छिक और संकट के समय में एक अत्यंत प्रभावशाली नेतृत्व कौशल बताया, जो महात्मा गांधी के सिद्धांतों से प्रेरित है।

हालांकि, ईंधन के मुद्दे पर भी पनगढ़िया ने प्रशासनिक नियंत्रण के बजाय मूल्य-आधारित संकेतों को अधिक प्रभावी माना। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को देश के भीतर पेट्रोल और डीजल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुरूप बढ़ने देनी चाहिए। उनका तर्क है कि जब कीमतें बढ़ेंगी, तो उपभोक्ता स्वयं अपनी खपत में कटौती करना शुरू कर देंगे। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां पेट्रोल की कीमतें लगभग 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ छह डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गईं, जिसके बाद बाजार ने खुद को संतुलित किया। यद्यपि उन्होंने माना कि भारत सरकार ने देश में ईंधन की कीमतों को बहुत कुशलता से संभाला है, फिर भी उन्होंने इस बात पर बल दिया कि बाहरी आर्थिक असंतुलन से निपटने के लिए विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) में लचीलापन ही भारत का सबसे मजबूत और कारगर हथियार है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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