ऐप बेस्ड टैक्सी सेवाओं पर टैक्स का संकट: ड्राइवर बोले- कमाई घटेगी और आर्थिक मुश्किलें बढ़ेंगी |
एसिया सेंटर के सर्वेक्षण के मुताबिक कुछ प्लेटफॉर्म्स पर पांच प्रतिशत अतिरिक्त जीएसटी लगने से ड्राइवरों की कमाई घटेगी और यात्रियों के लिए किराया बढ़ेगा।

नई दिल्ली की एक मुख्य सड़क पर डैशबोर्ड पर लगे मोबाइल ऐप के माध्यम से रास्ता देखते हुए गाड़ी चलाते ऐप-आधारित टैक्सी के चालक।
नई दिल्ली: भारत के शहरी परिवहन तंत्र में रीढ़ की हड्डी बन चुकी ऐप-आधारित टैक्सी सेवाओं के भविष्य पर आने वाले दिनों में एक बड़ा आर्थिक संकट मंडराता हुआ दिखाई दे रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से कैब बुकिंग सुलभ कराने वाली ओला और उबर जैसी प्रमुख कंपनियों के परिचालन मॉडल में टैक्स संबंधी बदलावों के कारण अब यात्रियों और चालकों दोनों के सामने गंभीर वित्तीय चुनौतियां खड़ी होने वाली हैं। पब्लिक पॉलिसी थिंक टैंक 'एसिया सेंटर' (Esya Centre) द्वारा जारी एक हालिया और व्यापक आर्थिक सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि कुछ विशिष्ट ऐप-आधारित टैक्सी प्लेटफॉर्म्स पर पांच प्रतिशत अतिरिक्त वस्तु एवं सेवा कर (GST) लगाने के प्रस्ताव ने इस क्षेत्र से जुड़े हितधारकों के बीच भारी चिंता का माहौल पैदा कर दिया है। इस नई नीतिगत व्यवस्था के लागू होने से न केवल दैनिक यात्रियों के लिए आवागमन काफी महंगा हो जाएगा, बल्कि रात-दिन सड़कों पर गाड़ियां दौड़ाने वाले ड्राइवरों की शुद्ध आय में भी भारी गिरावट आने की आशंका है।
एसिया सेंटर द्वारा देश के तेरह प्रमुख महानगरों और बड़े शहरों में एक हजार से अधिक कैब चालकों और नियमित यात्रियों के बीच किए गए इस विस्तृत सर्वेक्षण में कई चौंकाने वाले जमीनी तथ्य उजागर हुए हैं। सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, अधिकांश चालक वर्तमान में उन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को प्राथमिकता देते हैं जहां वे एक निश्चित सब्सक्रिप्शन शुल्क या तय चार्ज देकर ऐप से जुड़ते हैं और सवारी से प्राप्त होने वाला पूरा किराया अपने पास रख सकते हैं। इस प्रकार का फिक्स-फीस मॉडल ड्राइवरों को अपने दैनिक खर्चों को प्रबंधित करने और अधिक बचत करने की स्वतंत्रता देता है। हालांकि, नए टैक्स संशोधनों के कारण इस मॉडल की स्थिरता पर बड़ा खतरा मंडराने लगा है, जिससे असंगठित क्षेत्र के इन लाखों कामगारों के सामने अपनी आजीविका को बचाए रखने का एक अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है।
एसिया सेंटर की निदेशक मेघना बाल ने इस सर्वेक्षण के नतीजों और टैक्स के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण करते हुए बताया कि जब भी इस तरह का अतिरिक्त टैक्स ढांचा लागू किया जाता है, तो उसका सीधा और सबसे पहला आनुपातिक बोझ ड्राइवरों की परिचालन लागत पर पड़ता है। सर्वेक्षण में शामिल पचहत्तर प्रतिशत से अधिक कैब ड्राइवरों ने अत्यंत स्पष्ट रूप से यह आशंका व्यक्त की है कि यदि यह अतिरिक्त कर व्यवस्था अनिवार्य की जाती है, तो उनके मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा सरकारी खजाने और एग्रीगेटर कमीशन की भेंट चढ़ जाएगा। इसी आर्थिक तंगी और अनिश्चितता के कारण सर्वे में शामिल एक बड़ी संख्या में ड्राइवरों ने यह स्वीकार किया है कि यदि उनकी दैनिक शुद्ध आय इसी तरह घटती रही, तो वे इस ऐप-आधारित ड्राइविंग के पेशे को हमेशा के लिए अलविदा कह देंगे और अपने जीवनयापन के लिए बाजार में किसी दूसरे वैकल्पिक रोजगार या कामधंधे की तलाश शुरू कर देंगे।
टैक्स के विधिक और तकनीकी पहलुओं को देखें तो वर्तमान में उबर और ओला जैसी ज्यादातर ऐप-आधारित कैब सेवाओं का उपयोग करने वाले यात्रियों को अपने कुल राइड फेयर (कुल किराये) पर पांच प्रतिशत का मानक गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स देना होता है। मौजूदा कानूनी व्यवस्था और मानक कमीशन-बेस्ड मॉडल के अंतर्गत ये ऐप एग्रीगेटर कंपनियां इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का दावा करने के लिए पात्र नहीं होती हैं। भारतीय कर कानूनों के मुताबिक, इन एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म्स की यह वैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी होती है कि वे प्रत्येक यात्रा के किराये से इस निर्धारित पांच प्रतिशत जीएसटी को एकत्र करें और सीधे केंद्रीय एवं राज्य कर विभागों के खातों में जमा कराएं। ऐसे में यदि किसी भी स्तर पर अतिरिक्त पांच प्रतिशत की लेवी या तकनीकी फेरबदल किया जाता है, तो इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनुपलब्धता के कारण कंपनियों के पास किराये में बढ़ोतरी करने के अलावा कोई अन्य विधिक मार्ग शेष नहीं बचता है।
इस संभावित मूल्य वृद्धि का सीधा और प्रतिकूल असर उपभोक्ता व्यवहार पर भी पड़ना तय माना जा रहा है, जिससे इस पूरे डिजिटल ट्रांसपोर्ट उद्योग की विकास दर प्रभावित हो सकती है। सर्वेक्षण के दौरान लगभग दो-तिहाई यात्रियों ने बहुत साफ शब्दों में कहा है कि यदि करों के बोझ के कारण ऐप-आधारित कैब का किराया वर्तमान दरों से अधिक बढ़ता है, तो वे अपने बजट को संतुलित रखने के लिए इन ऐप्स से गाड़ियां बुक करना काफी कम कर देंगे। ऐसी स्थिति में उपभोक्ता सार्वजनिक परिवहन, ऑटो-रिक्शा या निजी वाहनों के उपयोग को प्राथमिकता देने लगेंगे। अंततः, यात्रियों की संख्या में होने वाली यह कमी सीधे तौर पर ड्राइवरों के दैनिक ट्रिप्स को घटा देगी, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और अधिक दयनीय हो जाएगी। यह संपूर्ण चक्र दर्शाता है कि एक छोटा सा कर संशोधन किस प्रकार भारत के गिग इकॉनमी और शहरी गतिशीलता के पूरे परिदृश्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
