zepto blinkit 10 minute delivery model crisis : भारतीय महानगरों की सड़कों पर दौड़ते पीले, लाल और नारंगी रंग के टी-शर्ट पहने राइडर्स आज आधुनिक अर्थव्यवस्था की पहचान बन चुके हैं। महज 10 मिनट में घर के दरवाजे पर सामान पहुँचाने का जो 'क्विक कॉमर्स' मॉडल कभी चमत्कार नजर आता था, आज वही मॉडल एक गहरे अस्तित्वगत संकट और नैतिक विवाद के घेरे में खड़ा है। नए साल की पूर्व संध्या पर जब पूरा देश जश्न की तैयारी कर रहा था, तब देशभर के करीब दो लाख से अधिक गिग वर्कर्स ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल का बिगुल फूंककर इस चमकदार चमक-धमक वाली इंडस्ट्री की स्याह हकीकत को उजागर कर दिया। यह हड़ताल केवल वेतन वृद्धि की मांग नहीं थी, बल्कि उस 10 मिनट की 'डेडलाइन' के खिलाफ एक विद्रोह था, जो राइडर्स की जान को जोखिम में डालकर उपभोक्ताओं की सुविधा को प्राथमिकता देता है।

इस संकट की जड़ें वैश्विक बाजार के रुझानों में छिपी हैं। जहाँ अमेरिका और यूरोप में 'बायक' और 'गेटिर' जैसे दिग्गज क्विक डिलीवरी प्लेटफॉर्म या तो दम तोड़ चुके हैं या वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं, वहीं भारत में यह मॉडल अकल्पनीय रफ़्तार से बढ़ा। ब्लिंकिट, स्विगी इंस्टामार्ट और जेप्टो जैसी कंपनियों ने शहरों के भीतर 'डार्क स्टोर्स' का एक सघन जाल बिछा दिया है। रियल एस्टेट विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2030 तक इन वेयरहाउस की संख्या तीन गुना बढ़कर 7,500 तक पहुँच जाएगी। लेकिन इस विशाल बुनियादी ढांचे के पीछे खड़ा राइडर आज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। खराब रेटिंग का डर, ट्रैफिक का दबाव और प्रदूषण की मार झेलते इन कामगारों का आरोप है कि कंपनियों का एल्गोरिदम उन्हें तेज और खतरनाक ड्राइविंग के लिए मजबूर करता है, जबकि कंपनियाँ दावा करती हैं कि 10 मिनट की डिलीवरी रफ़्तार से नहीं बल्कि बेहतर लॉजिस्टिक्स से संभव होती है।

निवेशकों के बीच भी अब इस मॉडल को लेकर बेचैनी साफ़ देखी जा सकती है। नए लेबर कोड के तहत गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा और बीमा देने की बढ़ती मांग ने वित्तीय स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यही कारण है कि अक्टूबर के बाद से जोमैटो और स्विगी जैसी दिग्गज कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। हालाँकि, जोमैटो और ब्लिंकिट के पेरेंट ग्रुप 'एटरनल' के सीईओ दीपेंद्र गोयल ने रिकॉर्ड ऑर्डर्स का हवाला देते हुए इस हड़ताल को कुछ 'शरारती तत्वों' की साजिश बताया है। उनके अनुसार, राइडर्स की सुरक्षा और आय का पूरा ध्यान रखा जा रहा है, लेकिन 102 रुपये प्रति घंटे की औसत कमाई के आंकड़े इस काम की कठिन परिस्थितियों और लंबी कार्य अवधि की ओर इशारा करते हैं।

अंततः, यह विवाद केवल एक कंपनी और उसके कर्मचारियों के बीच का नहीं है, बल्कि यह एक उभरते हुए बाजार के भविष्य का सवाल है। भारत के श्रम बाजार में कामगारों की प्रचुरता ने फिलहाल इस मॉडल को जीवित रखा है, जहाँ पुराने राइडर्स के छोड़ने पर नए तुरंत जुड़ जाते हैं। लेकिन क्या मानवीय संवेदनाओं और सुरक्षा की कीमत पर मिलने वाली यह रफ़्तार लंबे समय तक टिक पाएगी? यह सवाल आज भारत के नीति-निर्माताओं, उपभोक्ताओं और कंपनियों के सामने खड़ा है। क्विक डिलीवरी मॉडल का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या रफ़्तार और सुरक्षा के बीच कोई सम्मानजनक संतुलन बनाया जा सकता है या नहीं।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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