मां की अर्थी को नहीं मिला कंधा, सगे संबंधियों ने फेरा मुंह... तो सदियों पुरानी रस्में तोड़ बिहार की बेटियों ने दी मुखाग्नि
बिहार के जवाहनिया गांव में मानवता को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है, जहां अनाथ बहनों मौसमी और रोशनी ने अपनी मां बबिता देवी की अर्थी को खुद कंधा दिया। पिता की मृत्यु के बाद बेसहारा हुई इन बेटियों को गांव से कोई मदद नहीं मिली, जिसके बाद उन्होंने परंपराओं को तोड़ते हुए खुद मुखाग्नि दी।

पटना: बिहार के ग्रामीण अंचल से मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने समाज के खोखलेपन और परंपराओं के कठोर चेहरों को बेनकाब कर दिया है। पटना के पास स्थित जवाहनिया गांव में गरीबी और एकाकीपन से जूझ रही दो सगी बहनों, मौसमी कुमारी और रोशनी कुमारी ने वह साहस दिखाया जो आज के युग में विरल है। अपने पिता को डेढ़ साल पहले खो चुकी इन बेटियों ने बीते 20 जनवरी 2026 को अपनी मां, बबिता देवी की मृत्यु के बाद उनकी अर्थी को अपने कंधों पर उठाकर श्मशान तक का सफर तय किया। यह केवल एक अंतिम संस्कार नहीं था, बल्कि उन रूढ़ियों को दी गई एक मूक चुनौती थी, जो विपदा के समय अपनों का हाथ थामने के बजाय उन्हें अकेला छोड़ देती हैं।
मां की मृत्यु के बाद मौसमी और रोशनी के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी विदाई की थी। घर में कोई पुरुष सदस्य न होने और घोर आर्थिक तंगी के कारण इन अनाथ बहनों ने गांव में दर-दर भटककर मदद की गुहार लगाई, लेकिन विडंबना यह रही कि सहायता के लिए कोई हाथ आगे नहीं बढ़ा। अंततः अपनी मां को सम्मानजनक विदाई देने के संकल्प के साथ दोनों बहनों ने खुद ही अर्थी को कंधा दिया। लगभग 22 किलोमीटर लंबे इस कठिन सफर के दौरान कुछ स्थानीय युवकों ने मानवीयता दिखाते हुए थोड़ी दूरी तक उनकी मदद की, लेकिन रास्ते का अधिकांश हिस्सा इन बेटियों ने अपने आंसुओं और संकल्प के सहारे ही पार किया।
घाट पर पहुंचकर मौसमी कुमारी ने स्वयं मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार की रस्म को पूरा किया, जो कि पारंपरिक रूप से पुरुष प्रधान समाज में दुर्लभ माना जाता है। पिता के निधन के 18 महीने बाद मां का साया सिर से उठ जाने से यह परिवार पूरी तरह बिखर चुका है। अब इन बच्चियों के सामने आगामी श्राद्ध कर्म और जीवन यापन का गहरा संकट खड़ा है। जवाहनिया गांव की यह घटना न केवल प्रशासन के सामाजिक सुरक्षा के दावों पर सवाल उठाती है, बल्कि उस सामूहिक चेतना को भी कटघरे में खड़ा करती है, जो पड़ोस में हो रहे इस संघर्ष से अनजान बनी रही। यह हृदयविदारक दृश्य ग्रामीण भारत की उस गहरी विसंगति को दर्शाता है जहाँ आधुनिकता की बातें तो होती हैं, लेकिन संकट के समय एक परिवार को अपनी मां की अर्थी उठाने के लिए भी अकेला छोड़ दिया जाता है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
