Special Parliament session women reservation quota : भारतीय लोकतंत्र के मंदिर में एक बार फिर वैचारिक युद्ध की रणभेरी बजने वाली है। आगामी 16 अप्रैल से संसद का एक विशेष सत्र आहूत किया गया है, जिसका मुख्य केंद्र बिंदु वर्ष 2023 के महिला आरक्षण कानून को अमलीजामा पहनाने के लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधनों को पारित करना है। केंद्र की मोदी सरकार इस ऐतिहासिक कदम के जरिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने की अपनी प्रतिबद्धता को 2029 के चुनावों से पहले वास्तविकता में बदलना चाहती है। हालांकि, महिला सशक्तिकरण की इस बड़ी कवायद के पीछे परिसीमन और जनगणना की अनिवार्य शर्तों ने एक नए संवैधानिक और राजनीतिक संकट को जन्म दे दिया है, जिसने सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच मतभेदों की खाई को और गहरा कर दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे संवेदनशील मुद्दा परिसीमन का है, जिसे लेकर विपक्ष विशेषकर राहुल गांधी ने गंभीर सवाल उठाए हैं। एक हालिया लेख के जरिए उन्होंने सरकार की मंशा पर प्रहार करते हुए तर्क दिया है कि बिना ताज़ा जनगणना के आंकड़ों के इस कानून को लागू करने की जल्दबाजी घातक सिद्ध हो सकती है। अनुमानों के मुताबिक, यदि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन किया जाता है, तो लोकसभा में सीटों की कुल संख्या बढ़कर 816 तक पहुंच सकती है। विपक्ष का मुख्य तर्क यह है कि यह प्रक्रिया उन दक्षिणी राज्यों जैसे तमिलनाडु और केरल के साथ अन्याय होगी, जिन्होंने दशकों से जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू किया है। इन राज्यों को भय है कि कम आबादी के कारण संसद में उनका प्रतिनिधित्व घट जाएगा, जबकि अधिक जनसंख्या वाले उत्तर भारतीय राज्यों का वर्चस्व बढ़ जाएगा।

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को सिरे से खारिज करते हुए इसे राष्ट्र निर्माण का एक समावेशी कदम बताया है। सरकार का स्पष्ट तर्क है कि महिला आरक्षण को लागू करने से पहले सर्वसम्मति बनाना आवश्यक है और इस प्रक्रिया में किसी भी राज्य के राजनीतिक हितों का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। सरकार का मानना है कि परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है जो समय के साथ अनिवार्य है और इसे महिला आरक्षण जैसे प्रगतिशील कानून की राह में रोड़ा नहीं बनना चाहिए। सत्तापक्ष ने आश्वासन दिया है कि जनसंख्या स्थिरीकरण करने वाले राज्यों के अधिकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए जाएंगे, ताकि संघवाद का ढांचा प्रभावित न हो।


16 अप्रैल से शुरू हो रहा यह विशेष सत्र केवल विधायी कार्य का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह भारत के भविष्य की राजनीतिक दिशा तय करने वाला साबित होगा। एक तरफ आधी आबादी को सत्ता के केंद्र में लाने का सपना है, तो दूसरी तरफ उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की कठिन चुनौती है। संसद के भीतर होने वाली यह बहस यह निर्धारित करेगी कि क्या भारत पारदर्शिता और पारदर्शिता के साथ इस ऐतिहासिक परिवर्तन को स्वीकार कर पाता है या फिर परिसीमन का विवाद महिला आरक्षण के क्रियान्वयन में फिर से देरी का कारण बनता है। पूरे देश की नजरें अब सदन की कार्यवाही पर टिकी हैं, जहाँ महिला सशक्तिकरण और संघीय ढांचे की सुरक्षा के बीच एक महीन रेखा खींची जानी है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

Next Story