तहनाल में 106 वर्षीया सोहनदेवी की स्मृति में 125 गांवों का माहेश्वरी संगम
हेमराज लढ़ा ने माता की स्मृति में चारभुजानाथ प्रसादी के बहाने सर्वसमाज और 125 गांवों के माहेश्वरी बंधुओं को एकजुट कर सामाजिक समरसता की मिसाल पेश की।

भीलवाड़ा, 27 मार्च। भीलवाड़ा जिले के तहनाल में एक पुत्र ने अपनी दिवंगत माता की स्मृति को सामाजिक मेलमिलाप और पुरातन परंपराओं के पुनरुद्धार का अनूठा माध्यम बना दिया है। 106 वर्ष की दीर्घायु पूर्ण कर स्वर्गवासी हुई सोहनदेवी लादूलाल लढ़ा की स्मृति में उनके पुत्र हेमराज लढ़ा द्वारा आयोजित श्री चारभुजानाथ महाराज की प्रसादी ने एक वृहद सामाजिक आयोजन का स्वरूप ले लिया है। आगामी 28 मार्च, शनिवार को आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में केवल माहेश्वरी समाज ही नहीं, बल्कि जाति-पाति के बंधनों को तोड़ते हुए पूरी तहनाल ग्राम पंचायत के प्रत्येक परिवार को आमंत्रित कर भ्रातृत्व भाव की नई मिसाल पेश की गई है।
मूलतः तहनाल निवासी और वर्तमान में अहमदाबाद में प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद हेमराज लढ़ा की माता सोहनदेवी का गत 14 फरवरी को निधन हो गया था। माता की स्मृति को जीवंत रखने हेतु लढ़ा परिवार ने पारंपरिक भोज को सामाजिक एकता के अवसर में बदलने का संकल्प लिया। इस प्रसादी हेतु शाहपुरा नगर के समस्त माहेश्वरी परिवारों सहित शाहपुरा, जहाजपुर, हुरड़ा, माण्डलगढ़, कोटड़ी और काछोला तहसील क्षेत्र के करीब 125 गांवों के माहेश्वरी बंधुओं को सपरिवार निमंत्रित किया गया है। आयोजन का मुख्य ध्येय सभी समाजजनों को एक जाजम पर बिठाकर आपसी स्नेह, सौहार्द और एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनने की भावना को सुदृढ़ करना है।
इस आयोजन की विशिष्टता यह है कि इसमें तहनाल पंचायत की समस्त जातियों और बिरादरियों को समान रूप से आमंत्रित किया गया है, ताकि क्षेत्रवासियों में आपसी जुड़ाव और सामाजिक समरसता मजबूत हो सके। उल्लेखनीय है कि 106 वर्ष की आयु में भी सोहनदेवी पूर्णतः स्वस्थ थीं और उनके नए दांत व बाल भी उग आए थे। उनकी स्मृति को संजोने के लिए वियतनाम से विशेष पत्थर मंगाकर जयपुर के कारीगरों से उनकी प्रतिमा बनवाई गई है। हेमराज लढ़ा की अटूट मातृभक्ति का प्रमाण यह भी है कि उन्होंने अपने घर में मंदिर बनवाकर पिछले 36 वर्षों से माताजी की अखंड ज्योत प्रज्वलित कर रखी है। इस पुनीत कार्य में उनके तीनों पुत्र विकास, अभिषेक और रोहित लढ़ा भी सक्रियता से जुटे हुए हैं। यह आयोजन आधुनिक दौर में विलुप्त होती पुरातन संस्कृति और सामुदायिक एकजुटता को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक अनुकरणीय उदाहरण बनकर उभरा है।

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