पुरुषोत्तम मास में हरिशेवा उदासीन आश्रम में उमड़ी आस्था, शिवमहापुराण कथा में मिला विनम्रता और भक्ति का संदेश
भीलवाड़ा के हरिशेवा उदासीन आश्रम में पुरुषोत्तम मास के दौरान आयोजित श्रीशिव महापुराण कथा महोत्सव में डॉ. स्वामी निर्मल दास जी महाराज ने नारद मोह, कुबेर चरित्र और भक्ति के माध्यम से अहंकार त्याग व आध्यात्मिक जीवन का संदेश दिया।

भीलवाड़ा स्थित हरिशेवा उदासीन आश्रम में पुरुषोत्तम मास के दौरान आयोजित श्रीशिव महापुराण कथा के तृतीय दिवस पर श्रद्धालुओं ने कथा, आरती और धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता की।
भीलवाड़ा, 10 जून। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर हरिशेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर में धर्म, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का वातावरण निरंतर गहराता जा रहा है। सनातन सेवा समिति एवं महामंडलेश्वर स्वामी श्री हंसराम जी उदासीन महाराज के सान्निध्य में आयोजित श्रीशिव महापुराण कथा महोत्सव के तृतीय दिवस पर श्रद्धालुओं की बड़ी उपस्थिति के बीच कथाव्यास प्रखर वक्ता डॉ. स्वामी निर्मल दास जी महाराज ने अपने ओजस्वी प्रवचनों से उपस्थित जनसमूह को आध्यात्मिक जीवन के गहन संदेशों से जोड़ दिया।
कथावाचन के दौरान डॉ. स्वामी निर्मल दास जी महाराज ने ‘नारद मोह’ प्रसंग का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए कहा कि भगवान की भक्ति मनुष्य को अहंकार, मोह और अज्ञान से मुक्त कर आत्मकल्याण की ओर ले जाती है। उन्होंने बताया कि देवर्षि नारद ने तप और साधना के बल पर कामदेव पर विजय प्राप्त की, किंतु उसके पश्चात उत्पन्न सूक्ष्म अहंकार उनके लिए मोह का कारण बना। भगवान विष्णु ने अपनी माया के माध्यम से उन्हें विनम्रता का पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग जीवन को यह संदेश देता है कि ज्ञान, पद, शक्ति और साधना का अभिमान भी आध्यात्मिक पतन का कारण बन सकता है।
कथा में कुबेर के पूर्व चरित्र का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने बताया कि भगवान शिव की अनन्य आराधना और कठोर तपस्या के परिणामस्वरूप कुबेर को धन के अधिपति और देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि कुबेर की वास्तविक महानता उनके वैभव में नहीं, बल्कि उनकी भक्ति, निष्ठा और समर्पण में निहित है। धर्म और लोककल्याण के लिए उपयोग किया गया धन ही सार्थक माना जाता है।
अपने प्रवचन में उन्होंने मानव जीवन को दुर्लभ बताते हुए सत्संग, तीर्थयात्रा, जप और तप के महत्व पर बल दिया तथा श्रद्धालुओं को “ॐ हरये नमः” और “ॐ महेश्वराय नमः” मंत्रों के जप का महत्व बताया। पार्थिव शिवलिंग पूजन की महिमा बताते हुए उन्होंने कहा कि शास्त्रों में विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए श्रद्धा एवं विधिपूर्वक शिव आराधना का विशेष विधान बताया गया है।
महाभारत के प्रसंग का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने अर्जुन और दुर्योधन के चयन को जीवन दर्शन से जोड़ते हुए कहा कि अर्जुन ने सेना नहीं, बल्कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को चुना और यही आध्यात्मिक दृष्टि जीवन को सार्थक बनाती है। उन्होंने शिवपुराण को कर्मकांड तक सीमित न मानते हुए कहा कि इसमें उपासना, पूजन-विधि और धर्ममय जीवन के विस्तृत मार्ग का वर्णन है। साथ ही गुरु दीक्षा और शास्त्रोक्त पद्धति से साधना को आध्यात्मिक उन्नति का आधार बताया।
कथा के दौरान प्रस्तुत भजन “पकड़ लो बाँह रघुराई, नहीं तो डूब जाएँगे...” ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। स्वामी जी ने इसकी भावार्थ व्याख्या करते हुए कहा कि जीवन एक कठिन यात्रा है और प्रभु का मार्गदर्शन ही मनुष्य को भ्रम और विकारों से बचाता है। “ॐ नमः शिवाय” और “जय भोले” के उद्घोषों के बीच श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर होकर झूम उठे।
कथा समापन के बाद श्रद्धालुओं ने भगवान शिव की आरती में सहभागिता कर पूजन-अर्चन किया तथा प्रसाद ग्रहण किया। इससे पूर्व आयोजित प्रातःकालीन श्री विष्णु यज्ञ में कैलाश चंद्र, कन्हैया मोरयानी, हरीश-निशा आडवाणी, राजा-वर्षा टिक्यानी, रमेश मून्दड़ा एवं हनुमान प्रसाद अग्रवाल सहित श्रद्धालुओं ने आहुतियां अर्पित कर विश्वशांति और जनकल्याण की कामना की तथा रुद्राभिषेक किया।
आश्रम के संत मायाराम जी और संत गोविन्दराम जी ने बताया कि पुरुषोत्तम मास के दौरान प्रतिदिन सायंकाल काशी की तर्ज पर भव्य गंगा आरती, दुर्गा सप्तशती पाठ और अखंड रामधुन का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से इन धार्मिक आयोजनों में सहभागी बनकर आध्यात्मिक लाभ अर्जित करने का आग्रह किया।

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