संत दिग्विजय राम ने शंभूपुरा धर्मसभा में समझाया भक्ति और सेवा का महत्व
चित्तौड़गढ़ के शंभूपुरा में आयोजित धार्मिक सभा में संत ने निष्काम भक्ति, राष्ट्र निर्माण और भारतीय परंपराओं के वैज्ञानिक महत्व पर प्रकाश डाला।

शंभूपुरा में आयोजित धर्मसभा के दौरान उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते संत दिग्विजय राम। इस अवसर पर उन्होंने नरसी मेहता और शबरी के प्रसंगों के माध्यम से अटूट श्रद्धा का संदेश दिया और गौशाला हेतु दान राशि भेंट की।
शंभूपुरा (18 अप्रैल 2026): स्थानीय क्षेत्र में आयोजित धर्मसभा के दौरान संत दिग्विजय राम ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए भक्ति के मर्म को विस्तार से समझाया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि व्यक्ति के जीवन में धूप और छांव की तरह सुख-दुख आते रहेंगे, किंतु ऐसी परिस्थितियों में अपने इष्ट की भक्ति का मार्ग कभी नहीं त्यागना चाहिए। संत ने जोर देकर कहा कि भगवान से केवल स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रार्थना करना उचित नहीं है; भक्ति सदैव अहेतुकी और निस्वार्थ होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ईश्वर मिले या न मिले, यह अलग विषय है, परंतु मनुष्य को अपना कर्म पथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यह संपूर्ण कथा वस्तुतः ईश्वर पर अटूट विश्वास की गाथा है।
राष्ट्र निर्माण में योगदान की चर्चा करते हुए संत ने कहा कि हमारे देश के वास्तविक नायक खेतों में पसीने बहाने वाले किसान और सीमाओं पर डटे जवान हैं। आज सरहद पर तैनात सजग प्रहरियों के कारण ही देशवासी चैन की नींद सो पाते हैं। उन्होंने भक्त नरसी जी के जीवन का उदाहरण देते हुए बताया कि परमात्मा बिना मांगे ही बहुत कुछ प्रदान कर देता है, अतः उनसे सदैव याचना करने की आवश्यकता नहीं है। शबरी का दृष्टांत देते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति की पराकाष्ठा वही है जहाँ भक्त को भगवान के पास न जाना पड़े, बल्कि स्वयं श्री राम को शबरी की कुटिया तक आना पड़े। शबरी ने अपने गुरु मतंग ऋषि के वचनों पर विश्वास कर 70 वर्षों तक प्रभु का प्रतीक्षा की, जो अटूट श्रद्धा का प्रतीक है।
संत दिग्विजय राम ने वैष्णव परंपरा और भारतीय संस्कृति के वैज्ञानिक महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव दया का पात्र है और उसे प्रभु स्मरण करना चाहिए। जो व्यक्ति भगवान को भोग लगाए बिना अन्न ग्रहण करता है, वह पशु समान है। उन्होंने वैज्ञानिक तर्क देते हुए बताया कि चंदन का तिलक मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करता है, वहीं आरती की ऊष्मा नेत्र ज्योति बढ़ाती है। भारतीय धर्म चिन्ह सदैव विज्ञान की कसौटी पर खरे उतरे हैं।
कथा के भावुक प्रसंग में नानी बाई के मायरे का वर्णन करते हुए संत ने कहा कि एक पिता कभी अपनी पुत्री के आंसू नहीं देख सकता। नरसी जी ने अपनी पुत्री को सांत्वना देते हुए कहा था कि उनका सांवरा सेठ मायरा भरने अवश्य आएगा, और यदि नहीं आया तो संसार से मायरा भरने की रीत ही समाप्त हो जाएगी। उनका विश्वास इतना अडिग था कि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी प्रभु के गुणगान को निरंतर जारी रखने का संकल्प लिया था।
इस धार्मिक आयोजन के विशेष अवसर पर भगवान श्री श्याम बाबा को छप्पन भोग अर्पित किया गया। कथा के दौरान श्री राम गौशाला, निंबाहेड़ा हेतु 61,250 रुपये की दान राशि प्राप्त हुई, जिसे संत द्वारा श्री श्याम रंगीला बजरंग मित्र मंडल को सौंपा गया। कार्यक्रम के समापन पर श्री श्याम रंगीला बजरंग मित्र मंडल ने उपस्थित सभी भक्तों का आभार व्यक्त किया।

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