"कलयुग में सर्वश्रेष्ठ केवल ईश्वर का नाम है" - यह सारगर्भित उद्गार संत दिग्विजय राम ने श्रीलंका आध्यात्मिक यात्रा के अंतिम पड़ाव पर बेनटोटा शहर में आयोजित सत्संग के दौरान व्यक्त किए। श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि इस घोर कलयुग में केवल प्रभु का नाम ही वह एकमात्र माध्यम है, जो मनुष्य को इस संसार रूपी सागर से पार उतार सकता है। उन्होंने जीवन की नश्वरता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जिस प्रकार व्यक्ति भौतिक शरीर के पोषण हेतु भोजन के लिए समय निकालता है, ठीक उसी प्रकार उसे भजन के लिए भी समय अवश्य निकालना चाहिए। संत ने दर्शन देते हुए कहा कि जीवन का अटल सत्य यही है कि जो आया है वह जाएगा; यह शरीर पंचतत्वों से निर्मित है और अंततः उन्हीं में विलीन हो जाएगा। आत्मा केवल शरीर रूपी वस्त्र बदलती है, और जिस प्रकार नवीन वस्त्रों की चमक समय के साथ समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार शरीर का यौवन भी धीरे-धीरे ढल जाता है, अतः मनुष्य को सदैव प्रभु सिमरन करते हुए प्रसन्न रहना चाहिए।

रामस्नेही संप्रदाय के आद्याचार्य श्री रामचरण जी महाराज की 'अनुभव वाणी' का संदर्भ देते हुए संत ने बताया कि मानव तन अत्यंत दुर्लभ है और उससे भी अधिक भाग्य से सत्संग की प्राप्ति होती है। सत्संग मनुष्य के भीतर विवेक जागृत करता है और यही विवेक जीवन जीने का वास्तविक मार्ग प्रशस्त करता है। संतों के अनुसार सेवा, सुमरिन और सत्संग ही मानव जीवन का मूल लक्ष्य होना चाहिए। इस दौरान संत दिग्विजय राम ने पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि श्रीलंका में आज भी लोग 'हाय-हेलो' के स्थान पर अपनी संस्कृति के प्रचलित शब्दों से अभिवादन करते हैं, जबकि हमारे देश में पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाववश लोग अपनी जड़ों को भूल रहे हैं। उन्होंने स्मरण कराया कि हमारी संस्कृति 'राम-राम' करना सिखाती है, जहाँ अभिवादन से लेकर व्यक्ति की अंतिम यात्रा तक प्रभु का नाम ही साथ रहता है।

संस्कारों की महत्ता पर बल देते हुए उन्होंने अभिभावकों को सचेत किया कि बच्चों को संपत्ति दें या न दें, परंतु संस्कार अवश्य दें। यदि बालक संस्कारवान होंगे तो वे स्वयं संपत्ति अर्जित कर लेंगे, किंतु संस्कारविहीन होने पर दी गई पैतृक संपत्ति का भी विनाश सुनिश्चित है। नई पीढ़ी को संस्कृति के प्रति सजग करना अनिवार्य है, अन्यथा हमारी गौरवशाली संस्कृति लुप्त हो जाएगी। स्वामी रामचरण जी महाराज की वाणी को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में तीन कार्यों में कभी ढील नहीं करनी चाहिए: प्रथम राम भजन, दूसरा साधु दर्शन और तीसरा सेवा, परोपकार एवं दान।

तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस का उल्लेख करते हुए संत ने कहा कि "राम से बड़ा राम का नाम" है। भगवान के नाम की शक्ति अपार है और इसी नाम के आश्रय से हनुमान जी ने विशाल समुद्र को लांघ लिया था। सत्ता, संपत्ति, वैभव और यौवन का अभिमान व्यर्थ है क्योंकि सांसारिक वस्तुओं का अंत निश्चित है। जो व्यक्ति अपने आराध्य पर पूर्ण विश्वास रखकर नाम का आश्रय लेता है, उसका लोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं। अंततः, उन्होंने पुनः दोहराया कि जिस प्रकार शरीर के लिए भोजन आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मा की क्षुधा शांत करने के लिए भजन ही एकमात्र भोजन है।SA

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