बोहेड़ा में संत दिग्विजय राम का ओजस्वी प्रवचन: अहेतु भक्ति, कर्म और विश्वास की जीवंत व्याख्या
बोहेड़ा में आयोजित कथा में संत दिग्विजय राम ने अहेतु भक्ति, कर्म और ईश्वर पर अटूट विश्वास का संदेश दिया। नरसी जी, शबरी और भारतीय संस्कृति के वैज्ञानिक महत्व के उदाहरणों के साथ उन्होंने बताया कि निस्वार्थ भक्ति ही जीवन की सच्ची दिशा है।

बोहेड़ा (दिनांक 25 जनवरी 2026)। धार्मिक चेतना और भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा को स्वर देते हुए संत दिग्विजय राम ने बोहेड़ा में आयोजित कथा के दौरान अहेतु भक्ति, कर्म और ईश्वर पर अटूट विश्वास का गहन संदेश दिया। अपने ओजस्वी प्रवचन में उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति स्वार्थवश नहीं, बल्कि निस्वार्थ भाव से की जानी चाहिए। जीवन में सुख-दुःख, धूप-छाया का क्रम चलता रहता है, किंतु व्यक्ति को कभी भी अपने ईष्ट की भक्ति नहीं छोड़नी चाहिए।
संत दिग्विजय राम ने स्पष्ट किया कि ईश्वर को केवल मांगने के लिए स्मरण करना भक्ति नहीं है। भक्ति का वास्तविक स्वरूप अहेतु होता है, जहां भक्त बिना किसी अपेक्षा के प्रभु से जुड़ा रहता है। उन्होंने कहा कि आज हमारे पास जो कुछ भी है, वह ईश्वर की अनुकंपा से है, जिसे हमने कभी मांगकर प्राप्त नहीं किया। परमात्मा बिना कहे ही अपने भक्तों को बहुत कुछ प्रदान करता है। नरसी जी के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए संत ने बताया कि ईश्वर से मांगने की प्रवृत्ति नहीं, बल्कि विश्वास और कर्म का भाव जीवन को दिशा देता है।
कथा के दौरान संत दिग्विजय राम ने भारतीय समाज के वास्तविक नायकों को स्मरण करते हुए कहा कि खेत में खड़ा किसान और सीमा पर तैनात जवान ही देश के सच्चे रक्षक हैं। सीमाओं पर खड़े जवानों की वजह से ही देशवासी चैन की नींद सो पाते हैं। उन्होंने शबरी और भगवान राम के प्रसंग के माध्यम से भक्ति की पराकाष्ठा को रेखांकित करते हुए कहा कि शबरी स्वयं राम के द्वार नहीं गई, बल्कि अपने निष्कलुष विश्वास के कारण भगवान राम को शबरी के द्वार आना पड़ा। शबरी ने 70 वर्षों तक गुरु मतंग ऋषि के वचनों पर भरोसा कर प्रभु की प्रतीक्षा की, जो निस्वार्थ भक्ति का अनुपम उदाहरण है।
संत ने वैष्णव परंपरा और भारतीय संस्कृति के वैज्ञानिक महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भोजन से पूर्व भगवान को भोग अर्पित करना हमारी परंपरा है, और चंदन का तिलक, आरती तथा धार्मिक चिन्ह विज्ञान की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं। कथा में बेटी और पिता के संबंधों की भावनात्मक व्याख्या करते हुए नरसी जी और नानी बाई के मायरा प्रसंग का उल्लेख किया गया, जहां ईश्वर अपने भक्त की लाज रखने स्वयं पधारते हैं और 56 करोड़ का मायरा भरते हैं। संत ने कहा कि ईश्वर के भरोसे पर ही यह संसार टिका है और आज भी भगवान आने को तैयार हैं, बस मन में सच्चा भाव होना चाहिए।
कथा के समापन पर काबरा परिवार की ओर से सभी पधारे हुए भक्तजनों का आभार व्यक्त किया गया। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि भक्ति, विश्वास और कर्म के शाश्वत मूल्यों को जनमानस तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम भी सिद्ध हुआ।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
