समझदारों ने परिवार-समाज तोड़े, ‘पागलों’ ने परमात्मा को पाया: आचार्य रामदयालजी
माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आचार्य रामदयालजी महाराज ने प्रेम-भक्ति का महत्व बताया और चातुर्मास के विशेष आयोजनों की जानकारी दी।

तस्वीर में अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगतगुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज माणिक्यनगर रामद्वारा में प्रवचन देते हुए नजर आ रहे हैं, जिनके साथ अन्य संत भी बैठे हैं।
अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगतगुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने कहा कि दुनिया कंचन-कामिनी के लिए पागल है, लेकिन भक्त परमात्मा के लिए पागल होता है। देशभक्त राष्ट्र के लिए दीवाने होते हैं। ऐसे पागल समझदारों से बेहतर होते हैं। समझदारों ने परिवार और समाज तोड़े, जबकि पागलों ने परमात्मा को पाया है।
माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास के तहत आयोजित दैनिक सत्संग में रविवार को प्रेम-भक्ति के स्वरूप की व्याख्या करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि ध्रुव, प्रह्लाद और मीरा दुनिया की नजरों में पागल बने हुए थे। ऐसा पागलपन किसी के संकल्प से नहीं, बल्कि कई जन्मों के पुण्यों से सौभाग्यशाली व्यक्ति को मिलता है। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने को ही पागलपन कहते हैं।
उन्होंने कहा कि भक्ति की मस्ती जिसके जीवन में आ जाती है, उसे कोई ठुकरा नहीं पाता और पूरा संसार उसे नमन करता है। भक्ति की ऐसी मस्ती लोकलाज की परवाह नहीं करती। भक्ति दिल को छू लेने वाली होती है। उन्होंने कहा, “एक हाथ में शस्त्र और एक हाथ में शास्त्र, ये हमारी संस्कृति है।”
आचार्यश्री ने कहा कि भक्त के बुलाने पर भगवान आते हैं, यही प्रेम है। कितना भी कष्ट हो, जहां सामने प्रेम होता है, वहां जाने का मन करता है। वहीं, कहीं कंचन की बारिश हो रही हो, लेकिन प्रेम और सम्मान नहीं हो तो वहां जाने का मन नहीं करेगा। एक बार प्रेम से पुकारने पर परमात्मा दौड़े चले आते हैं। उन्होंने कहा कि प्रेम-भक्ति अलौकिक एवं विलक्षण होती है। शबरी के प्रेम के कारण ही राम उसके झूठे बेर खाते हैं। जीवन समाप्त हो सकता है, लेकिन प्रेम-भक्ति समाप्त नहीं हो सकती।
आचार्यश्री ने कहा कि संसार में कई लोग अपने दुख से नहीं, बल्कि दूसरों के सुख से दुखी रहते हैं। उनके जीवन में प्रेम-भक्ति नहीं होती है। भक्ति में प्रेम होना चाहिए, क्योंकि प्रेम के बिना भक्ति अपूर्ण होती है और प्रेम के बिना आत्मानंद नहीं मिल सकता। जहां अहं प्रस्फुटित होता है, वहां परंपराओं में टकराव चलता है, जबकि जहां प्रेम प्रकट हो जाता है, वहां समन्वय और सद्भाव होता है।
उन्होंने कहा कि प्रेम-भक्ति से गुरु के पास बैठकर परम आनंद की प्राप्ति होती है। पत्नी का पति से प्यार नहीं, प्रेम होता है, जिसमें भक्ति का भाव होता है। प्रेम में कोई व्यापार या छुपाव नहीं होता।
चातुर्मास के तहत 25 से 27 सितंबर तक विशेष आयोजन होंगे। 25 सितंबर को संध्या आरती के बाद सार्वजनिक, सामूहिक भक्ति संध्या का आयोजन किया जाएगा, जिसमें संप्रदाय की परंपरा के भजन भक्तजन सामूहिक रूप से गाएंगे। 26 सितंबर को प्रवचन के साथ ही आचार्यश्री के अवतरण दिवस पर आनंदोत्सव का दिव्य, भव्य आयोजन होगा। 27 सितंबर को आचार्यश्री के सानिध्य में संत सम्मेलन आयोजित किया जाएगा, जिसमें विभिन्न स्थानों से संत पधारकर अपना प्रवचन और मार्गदर्शन प्रदान करेंगे।
आचार्यश्री से पूर्व अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी राम जी राम आलोट ने मानस पर प्रवचन दिया। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की।
एकादशी के उपलक्ष्य में दोपहर 3 से 4 बजे तक संप्रदाय के प्रथम आचार्य श्री रामजन्न जी महाराज की वाणी का पाठ, छंद भुजंगी एवं भजन हुए। इसके साथ ही शाम 4 से 5 बजे तक राम साधना मंडल की ओर से श्वासों-श्वास राम नाम साधना शिविर आयोजित किया गया, जिसमें अनेक भक्तजन उपस्थित रहे।
सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। चातुर्मास में दैनिक सत्संग का समय सुबह 9 से 10 बजे तक है। रामधुनी के साथ सुबह 8.30 से 9 बजे तक वाणीजी का पाठ हो रहा है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती और रामस्नेही संप्रदाय के युवा संत रामजस जी ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

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