भीलवाड़ा, 27 जुलाई। अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगद्गुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने कहा कि शिव और संत दोनों की एक ही परिभाषा है। दोनों जहर पीकर अमृत प्रदान करते हैं। संत का कोई निजी लक्ष्य नहीं होता, बल्कि उसका उद्देश्य राष्ट्र और समाज को सुखी बनाना होता है। विचारों और वाणी से अमृत प्रदान करने वाला ही सच्चा संत होता है तथा जो संताप का अंत कर मन को शांति प्रदान करे, वही संत कहलाने योग्य है। उन्होंने कहा कि संत किसी भी परिस्थिति में अपनी सज्जनता और स्वभाव का त्याग नहीं करते।



आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज सोमवार को भीलवाड़ा स्थित माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में “विश्व शांति कल्याण” चातुर्मास के तहत आयोजित दैनिक सत्संग को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने संत की परिभाषा और उसकी महिमा पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि विकट परिस्थितियों में भी व्यक्ति शांत रहना सीख ले तो वह संत बन जाएगा। यदि उच्च आदर्शों पर चलेगा तो पंथ बन जाएगा और यदि अपने अनुभवों को अर्चना के रूप में अभिव्यक्त करता रहेगा तो वे आगे चलकर ग्रंथ बन जाएंगे। उन्होंने कहा कि स्वामी रामचरणजी महाराज महान संत थे, उनकी अनुभव वाणी महान ग्रंथ है और उनके विचार एक रामस्नेही पंथ का स्वरूप हैं।

आचार्यश्री ने कहा कि जहां संत प्रकट होते हैं, वह स्थान स्वयं तीर्थ बन जाता है। भीलवाड़ा की धरा भी स्वामी रामचरणजी महाराज के रामस्नेही संप्रदाय का प्राकट्य स्थल होने के कारण तीर्थ भूमि बन गई है। उन्होंने कहा कि दिन और रात के आठों पहर जो राम के साथ अपना संबंध बनाए रखे, वही संत होता है।



उन्होंने कहा कि जीवन में ज्ञान समाधान है और अज्ञान समस्या। संत शांत रहकर समस्याओं का समाधान करने वाला होता है तथा ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था का नाम ही संत है। उन्होंने कहा कि साधना एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है, इसलिए इसमें जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए।

जीवन रूपी घड़ी का उदाहरण देते हुए आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने कहा कि सेकेंड का कांटा जीवात्मा, मिनट का कांटा आत्मा और घंटे का कांटा परमात्मा होता है। घड़ी हमारे हाथ में है और हमें स्वयं तय करना है कि हमें कौन-सा कांटा बनना है। समय ही प्रत्येक कांटे का महत्व निर्धारित करता है।

उन्होंने कहा कि जीवन में अभाव ही समय का बोध कराता है और अभाव से ही प्रतिभाएं उजागर होती हैं। उन्होंने डॉ. भीमराव अम्बेडकर का उदाहरण देते हुए कहा कि वे भी अभाव से निकलकर देश के संविधान निर्माता बने, जिनकी प्रतिमाएं आज चौराहों पर स्थापित हैं।

आचार्यश्री ने कहा कि साधना तभी सफल होती है, जब वह प्रेम और श्रद्धा के साथ की जाए। मंदिर जाने की परंपरा आज भी जीवित है, लेकिन साधना में प्रेम का अभाव दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा अडिग होनी चाहिए।

आचार्यश्री के प्रवचन से पूर्व अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस पर प्रवचन दिया। संत श्रीरामजसजी ईडर वाले ने भजन प्रस्तुत किए। प्रवचन के विश्राम के बाद श्रद्धालुओं ने आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज की आरती की। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

आचार्यश्री के सानिध्य में बुधवार को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विशेष आयोजन होगा। इस अवसर पर देश और विदेश से रामस्नेही श्रद्धालु भीलवाड़ा पहुंचेंगे। चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन सुबह 9 से 10 बजे तक सत्संग आयोजित किया जा रहा है। प्रातः 5 से 6 बजे तक रामधुनी, सुबह 8:30 से 9 बजे तक वाणीजी का पाठ तथा सूर्यास्त के समय संध्या आरती का आयोजन हो रहा है। संध्या आरती के उपरांत श्रद्धालु आधे घंटे तक राम नाम का जप भी कर रहे हैं।

Pratahkal Newsroom

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