रामेश्वरम। भक्ति, शक्ति और संस्कारों की पावन धरा रामेश्वरम में आध्यात्मिक चेतना का शंखनाद करते हुए रामस्नेही संप्रदाय के प्रतिष्ठित संत दिग्विजयराम जी महाराज ने जीवन के मर्म को उद्घाटित किया। श्रीमद्भागवत कथा आयोजक मंडल द्वारा आयोजित सप्त दिवसीय महोत्सव के तृतीय दिवस पर व्यासपीठ से अमृत वर्षा करते हुए संत श्री ने समाज को अपनी जड़ों की ओर लौटने का आह्वान किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि कलयुग के इस दौर में भागवत कथा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन जीने की वह श्रेष्ठ कला है जो हमें माता-पिता और गुरुओं के चरणों में स्वर्ग का दर्शन कराती है। कथा के दौरान भावुक कर देने वाले प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस घर में बुजुर्गों का सम्मान होता है, वह घर स्वयं तीर्थ बन जाता है।

संत दिग्विजयराम ने भक्त ध्रुव के चरित्र का जीवंत चित्रण करते हुए बताया कि कैसे एक बालक ने महर्षि नारद के आशीर्वाद और द्वादश अक्षर मंत्र के जाप से साक्षात नारायण की गोद प्राप्त की। उन्होंने कहा कि पिता राजा उत्तानपात द्वारा किए गए निरादर के बावजूद ध्रुव ने अपनी माता से प्राप्त संस्कारों और अडिग भक्ति के बल पर वह 'अटल पद' प्राप्त किया, जो आज भी ध्रुव तारे के रूप में ब्रह्मांड में विद्यमान है। संत श्री ने ध्रुव के प्रजापति की कन्या व ईला के साथ विवाह, उनके 36 हजार वर्षों के न्यायप्रिय शासन और बद्री विशाल में की गई उनकी उस कठिन तपस्या का भी उल्लेख किया, जहाँ माँ गंगा भी उनकी भक्ति के प्रभाव से मौन होकर प्रवाहित होने लगी थीं। उन्होंने इस प्रसंग से सीख दी कि भक्ति में इतनी शक्ति है कि स्वयं यमराज को भी भक्त के चरणों में मस्तक झुकाना पड़ता है।





कथा के प्रवाह को आगे बढ़ाते हुए महाराज ने राजा अंग के पुत्र वेन की दुष्ट प्रवृत्ति और उसके विनाश की चर्चा की, जिसके माध्यम से उन्होंने आधुनिक समाज में मातृ-पितृ देवो भवः के संस्कारों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने राजा पृथु के अलौकिक जन्म और उनके द्वारा किए गए 99 अश्वमेघ यज्ञों का वृत्तांत सुनाया। जब यज्ञ भगवान ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा, तो राजा पृथु ने अपनी निस्वार्थ भक्ति का परिचय देते हुए प्रभु की कथा सुनने के लिए 10 हजार कान (कर्ण) मांगे। इसी क्रम में नारद जी द्वारा पुरंजन उपाख्यान और पुरंजनी को दिए गए ज्ञान का वर्णन करते हुए संत ने स्पष्ट किया कि कथा के श्रवण से केवल आत्मा ही नहीं, बल्कि मनुष्य की बुद्धि भी श्रेष्ठ और सात्विक हो जाती है।

धार्मिक ऐतिहासिकता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने राजा प्रियव्रत द्वारा सात द्वीपों और सात समुद्रों के निर्माण तथा ऋषभ अवतार के संदर्भ में भारत के नामकरण की महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम पर ही हमारे देश का नाम 'भारत' हुआ। इसके पश्चात जड़ भरत की कथा, माँ भवानी के प्राकट्य और अजामिल उपाख्यान के माध्यम से उन्होंने नाम-संकीर्तन की महिमा बताई। कथा के अंतिम चरण में हिरण्यकश्यप और भक्त प्रहलाद के प्रसंग ने श्रद्धालुओं को रोमांचित कर दिया। संत श्री ने बताया कि जब अहंकार की तलवार खंभ पर चली, तब भक्त के विश्वास को सत्य करने के लिए भगवान नृसिंह प्रकट हुए। इस मार्मिक प्रसंग के साथ उन्होंने संदेश दिया कि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है, बस प्रहलाद जैसी अटूट निष्ठा की आवश्यकता है। महाआरती के साथ तृतीय दिवस की कथा संपन्न हुई, जिसमें आयोजक मंडल परिवार सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने ठाकुर रामनाथ स्वामी जी और व्यासपीठ का पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

Pratahkal Bureau

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