मारुति सुजुकी को 10.20 लाख का मुआवजा देने का आदेश, एयरबैग न खुलने पर उपभोक्ता आयोग का फैसला
भीलवाड़ा उपभोक्ता आयोग ने एस-क्रॉस कार दुर्घटना मामले में एयरबैग नहीं खुलने पर कंपनी को सेवा में कमी का दोषी माना है।

सुरक्षा के दावों के साथ बेची जाने वाली आधुनिक कारों की विश्वसनीयता पर तब सवालिया निशान लग गया, जब भीलवाड़ा में एक भीषण सड़क दुर्घटना के दौरान मारुति सुजुकी की एक प्रीमियम कार के एयरबैग्स नहीं खुले। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, भीलवाड़ा ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए वाहन निर्माता कंपनी को एक कड़ा सबक सिखाया है। आयोग ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में इसे गंभीर निर्माणगत दोष (मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट) करार दिया है और पीड़ित कार मालिक को कुल 10.20 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश जारी किया है।
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत वर्ष 2018 में हुई, जब भीलवाड़ा के निवासी मनीष कुमार सोनी ने मारुति सुजुकी की 'एस-क्रॉस स्मार्ट हाइब्रिड अल्फा' कार खरीदी थी। कंपनी ने इसे अत्याधुनिक सुरक्षा फीचर्स से लैस बताकर बाजार में उतारा था। हालांकि, 25 दिसंबर 2019 की शाम को मनीष कुमार के लिए यह दावा खोखला साबित हुआ। राजसमंद यात्रा के दौरान अचानक सामने आई नीलगाय से टकराकर उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई। टक्कर इतनी भीषण थी कि वाहन का अगला हिस्सा पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया, लेकिन गाड़ी में लगे सुरक्षा कवच यानी एयरबैग्स एक बार भी नहीं खुले।
परिवादी ने अपने अधिवक्ता दीपक मित्तल और अंशुल शर्मा के माध्यम से जिला उपभोक्ता आयोग में परिवाद दायर कर कंपनी की सुरक्षा गुणवत्ता पर सवाल उठाए। आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलों और साक्ष्यों का बारीकी से विश्लेषण किया। अपनी सुनवाई में आयोग ने पाया कि कार का अगला हिस्सा पूरी तरह पिचक जाने के बावजूद एयरबैग का न खुलना तकनीकी खामी और स्पष्ट निर्माणगत दोष को दर्शाता है। विपक्षी वाहन निर्माता कंपनी आयोग के समक्ष ऐसा कोई भी संतोषजनक तकनीकी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी, जो यह प्रमाणित करता कि एयरबैग प्रणाली दोषमुक्त थी।
आयोग ने इसे 'सेवा में कमी' और 'अनुचित व्यापार व्यवहार' की श्रेणी में रखा है। इस मामले में फैसला सुनाते हुए आयोग ने विपक्षीगणों को दो महीने के भीतर कुल 10.20 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। इसमें वाहन की बीमित राशि के रूप में 9,06,203 रुपये, मानसिक संताप एवं क्षतिपूर्ति के लिए 93,797 रुपये तथा अधिवक्ता शुल्क एवं परिवाद व्यय के तौर पर 20,000 रुपये शामिल हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित दो माह की अवधि में मुआवजे का भुगतान नहीं किया जाता है, तो कंपनी को निर्णय की तिथि से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर से अतिरिक्त राशि का भुगतान करना होगा। यह फैसला न केवल पीड़ित उपभोक्ता के लिए न्याय की जीत है, बल्कि वाहन सुरक्षा मानकों को लेकर लापरवाही बरतने वाली कंपनियों के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है।

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