चित्तौड़गढ़ के रामद्वारा में आयोजित शिव पुराण कथा के दौरान संत दिग्विजय राम ने सत्संग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सत्संग में व्यक्ति को भगवान की अनुभूति होती है। उन्होंने कहा कि जीव यदि आनंद चाहता है तो उसे सत्संग करना चाहिए और साधु दर्शन भी भावपूर्वक करना चाहिए।

संत दिग्विजय राम ने कहा कि व्यक्ति कितना ही तामसिक क्यों न हो, लेकिन साधु दर्शन मात्र से उसके तामसिक गुण नष्ट होने लगते हैं। इससे व्यक्ति काम, क्रोध और लोभ को जीत लेता है तथा उसका मन निर्मल हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार कुसंगति से बचकर सत्संग करना चाहिए।



उन्होंने सत्संग के प्रभाव को समझाते हुए कहा कि लकड़ी एक ही होती है, लेकिन यदि किसान का संग करे तो चूल्हे में जलकर राख बनती है और यदि संत की संगत करे तो वेदी में जलकर राख बनती है। उस राख को संसार अपने सिर पर धारण करता है। उन्होंने कहा कि सत्संग में व्यक्ति को ईश्वर की अनुभूति होती है और ईश्वर का वास सत्संग में होता है। सत्संग भी व्यक्ति को संत कृपा से ही प्राप्त होता है।

संत दिग्विजय राम ने कहा कि साधना से केवल व्यक्ति का कल्याण होता है, जबकि सत्संग करने से व्यक्ति स्वयं के साथ संसार का भी कल्याण करता है। सत्संग के लिए कहीं दूर जाना पड़े तो भी जाना चाहिए, लेकिन यदि कुसंगति घर बैठे मिले तो भी उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति को प्रारब्ध का फल तो भोगना पड़ता है, लेकिन सत्संग में जाने से कष्टदायक समय कब गुजर जाता है, इसका पता ही नहीं चलता। एक पल का सत्संग जीवन के पाप, परिताप और संताप को समाप्त कर देता है।

शिव पुराण का उल्लेख करते हुए संत दिग्विजय राम ने कहा कि सामान्य दिनों की अपेक्षा सूर्य संक्रांति को दिए गए दान का फल 10 गुना अधिक मिलता है। यदि व्यक्ति मकर संक्रांति के दिन दान करता है तो उससे भी 10 गुना अधिक फल मिलता है। उससे अधिक फल चंद्र ग्रहण में और चंद्र ग्रहण से भी अधिक लाभ सूर्य ग्रहण के दिन दिए गए दान से मिलता है। उन्होंने कहा कि कई सूर्य ग्रहण में दिए गए दान से भी अधिक फल महापुरुषों के सत्संग से प्राप्त होता है।

संत दिग्विजय राम ने कहा कि हरि कथा एवं सत्पुरुषों का सत्संग बड़ा ही दुर्लभ है। सत्संग में कानों से हरि का नाम सुनना और जिह्वा से हरि का नाम लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि सत्संग में किसी प्रकार का प्रपंच नहीं करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि संसार में हर जीव आनंद चाहता है और सत्संग में जाने से अति आनंद प्राप्त होता है। सुख का सागर राम है और दुख का भंजनहार भी वही है। उस सुख के सागर में से व्यक्ति कितना प्राप्त कर सकता है, यह उसके स्वयं के सामर्थ्य पर निर्भर करता है। रामद्वारा में शिव पुराण कथा के दौरान सत्संग को जीवन के कल्याण और आत्मिक आनंद का माध्यम बताते हुए संत दिग्विजय राम ने श्रद्धालुओं को कुसंगति से बचने और सत्पुरुषों की संगति अपनाने का संदेश दिया।

Pratahkal Newsroom

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