भीलवाड़ा में जश्न के साथ अंतिम विदाई: 100 वर्ष की जमना देवी माली का 'शतायु' देवलोकगमन, बैंड-बाजों और ऊंट की सवारी के साथ निकला बैकुंठ
भीलवाड़ा की नेहरू रोड निवासी 100 वर्षीया जमना देवी माली के निधन पर उनकी अंतिम यात्रा को एक उत्सव की तरह मनाया गया। बैंड-बाजों, ढोल-नगाड़ों और ऊंट की सवारी के साथ निकली इस भव्य बैकुंठ यात्रा ने पूरे शहर का ध्यान खींचा। स्वर्गीय प्यार चंद माली की पत्नी जमना देवी अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गई हैं। पढ़िए, कैसे एक शताब्दी पूर्ण करने वाली इस महान महिला को समाज ने दी ऐतिहासिक विदाई।v

भीलवाड़ा। राजस्थान की वस्त्र नगरी भीलवाड़ा के नेहरू रोड क्षेत्र में आज एक ऐसी विदाई देखने को मिली, जिसने शोक के माहौल को उत्सव और गौरव में बदल दिया। नेहरू रोड निवासी और स्वर्गीय प्यार चंद माली की धर्मपत्नी, जमना देवी माली ने 100 वर्ष की दीर्घायु पूर्ण कर इस नश्वर संसार से विदा ली। एक शताब्दी का लंबा और अनुभवजन्य जीवन जीने वाली जमना देवी के निधन को उनके परिजनों और समाज ने 'शतायु उत्सव' के रूप में मनाया, जो भारतीय संस्कृति में पूर्ण जीवन का प्रतीक माना जाता है।
जमना देवी माली अपने पीछे दो पुत्रों और तीन पुत्रियों सहित पोते-पोतियों और परपोतों से भरा-पूरा परिवार छोड़ कर गई हैं। उनका जीवन संघर्ष, सेवा और पारिवारिक मूल्यों की एक जीवंत मिसाल रहा। जैसे ही उनके देहावसान की सूचना फैली, पूरे क्षेत्र में उनके दीर्घायु जीवन की चर्चाएं शुरू हो गई। शोक संतप्त परिवार ने उनकी अंतिम यात्रा को साधारण शोक यात्रा के बजाय एक गौरवशाली विदाई देने का निर्णय लिया, जो बुजुर्गों के प्रति सम्मान और उनके पूर्ण जीवन की सफलता का उद्घोष था।
आज गुरुवार को नेहरू रोड स्थित उनके निवास स्थान से उनकी अंतिम यात्रा अत्यंत भव्य तरीके से रवाना हुई। इस बैकुंठ यात्रा का दृश्य किसी उत्सव से कम नहीं था, जहाँ गूंजते बैंड-बाजे, ढोल-नगाड़ों की थाप और पारंपरिक ऊंट की सवारी के साथ जमना देवी को अंतिम विदाई दी गई। सड़कों पर जिसने भी इस दृश्य को देखा, वह उस 'शतायु' आत्मा को नमन किए बिना नहीं रह सका। फूलों से सजे वाहन और भक्तिमय गीतों के साथ यह यात्रा पोरवाल हॉस्पिटल के समीप स्थित मालियों के मोक्षधाम पहुँची।
मोक्षधाम में उपस्थित जनसमूह की मौजूदगी में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार परिवारजनों ने उन्हें मुखाग्नि दी। जमना देवी का जाना केवल एक परिवार की क्षति नहीं है, बल्कि यह एक युग का अंत है जिसने भीलवाड़ा के सामाजिक बदलावों को अपनी आँखों से देखा। उनकी यह विदाई इस बात का संदेश दे गई कि जब जीवन पूर्णता और शुचिता के साथ जिया जाता है, तो मृत्यु भी एक मंगलमय उत्सव बन जाती है।

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