वस्त्र नगरी भीलवाड़ा में बुधवार को शीतला अष्टमी (बास्योड़ा) का पर्व पारंपरिक हर्षोल्लास और उमंग के साथ मनाया गया। होली के आठ दिन बाद आने वाले इस रंग पर्व पर सुबह से ही शहर की गलियां और चौराहे गुलाल के बादलों से घिरे नजर आए। हालांकि, आधुनिकता के प्रभाव के चलते कुछ क्षेत्रों में पिछले वर्षों की तुलना में जोश में आंशिक कमी देखी गई, लेकिन युवाओं और बच्चों की टोलियों ने उत्साह में कोई कसर बाकी नहीं रखी।

गली-मोहल्लों में उड़ी गुलाल, डीजे की धुन पर थिरके युवा

सुबह होते ही शहर के विभिन्न मोहल्लों में हुरियारों की टोलियां एक-दूसरे को सराबोर करने निकल पड़ीं। पुराने भीलवाड़ा के भीतरी क्षेत्रों में जहाँ ढोल की थाप पर पारंपरिक होली गीतों और हास्य-व्यंग्य की गूंज रही, वहीं नए शहर की कॉलोनियों में डीजे की तेज धुन पर युवा थिरकते नजर आए। कई स्थानों पर पानी के टैंकरों और बड़े ड्रमों के साथ युवाओं ने जमकर होली खेली। इस बार युवाओं में पक्के रंगों, विशेषकर सिल्वर, नीले और काले रंगों का खासा क्रेज देखा गया।

शीतला माता को लगा ठंडे पकवानों और 'ओलिया' का भोग

धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप, बुधवार को शहर के घरों में चूल्हे नहीं जले। माता शीतला को एक दिन पूर्व तैयार किए गए ठंडे व्यंजनों, राबड़ी और दही-चावल से बने विशेष 'ओलिया' का भोग लगाया गया। दोपहर तक रंग खेलने के बाद, शाम को लोग नए वस्त्र पहनकर एक-दूसरे के घर पहुंचे, जहाँ ठंडे पकवानों का लुत्फ उठाते हुए पर्व की शुभकामनाएं दी गईं।

पर्व का सारांश

"वस्त्र नगरी भीलवाड़ा में शीतला अष्टमी पर सुबह से ही गलियां और चौराहे गुलाल के बादलों से घिरे नजर आए।"

"पुराने भीलवाड़ा में ढोल की थाप पर पारंपरिक होली गीत गूंजे, तो नए शहर में डीजे की धुन पर युवा थिरके।"

Pratahkal Bureau

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