भीलवाड़ा: शंकर सिंह हत्याकांड से दहला जिला, मोर्चरी से कलेक्ट्रेट तक न्याय की हुंकार के बाद थमा 48 घंटे का संग्राम
भीलवाड़ा में शंकर सिंह हत्याकांड ने मचाया बवाल। चोरी के शक में होटल में हुई हत्या के बाद 48 घंटे तक चला भारी प्रदर्शन। कलेक्ट्रेट घेराव के बाद जिला कलेक्टर ने सरकारी नौकरी, मुआवजे और आरोपियों की जल्द गिरफ्तारी का दिया आश्वासन। मोर्चरी से लेकर सड़कों तक गूंजी न्याय की मांग, जानें पूरी रिपोर्ट।

भीलवाड़ा। चित्तौड़गढ़ नेशनल हाईवे पर स्थित एक होटल की चारदीवारी के भीतर मानवता को शर्मसार कर देने वाली वारदात ने पूरे भीलवाड़ा जिले को झकझोर कर रख दिया है। चोरी के महज शक में पीट-पीटकर मौत के घाट उतारे गए शंकर सिंह के परिजनों का आक्रोश शनिवार को उस समय ज्वालामुखी बनकर फूटा, जब महात्मा गांधी अस्पताल की मोर्चरी से लेकर कलेक्ट्रेट परिसर तक न्याय का शंखनाद गूंज उठा। पिछले 48 घंटों से जारी गतिरोध और तनाव के बीच, जिला प्रशासन के कड़े आश्वासनों के बाद आखिरकार पीड़ित परिवार का गुस्सा शांत हुआ और न्याय की उम्मीद के साथ शव का अंतिम संस्कार करने पर सहमति बनी।
घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब परिजनों ने आरोप लगाया कि शंकर सिंह, जो अपने परिवार का एकमात्र आर्थिक सहारा था, उसे होटल संचालकों ने बिना किसी ठोस आधार के चोर घोषित कर दिया। आरोप है कि होटल के भीतर उसे बंधक बनाकर बेरहमी से पीटा गया, जिससे उसकी मौत हो गई। गुरुवार की सुबह से ही महात्मा गांधी अस्पताल की मोर्चरी के बाहर सन्नाटा नहीं, बल्कि इंसाफ की मांग कर रही भीड़ का शोर था। पुलिस और प्रशासन द्वारा की गई समझाइश के शुरुआती दौर नाकाम रहे, क्योंकि परिजनों की मांगें स्पष्ट और अडिग थीं। जैसे-जैसे सूरज चढ़ता गया, आक्रोश की लपटें कलेक्ट्रेट तक जा पहुंचीं, जहां सैकड़ों की तादाद में समाज के लोग और ग्रामीण धरने पर बैठ गए।
कलेक्ट्रेट के घेराव ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया। पुलिस और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई और माहौल में तनाव व्याप्त हो गया। स्थिति की गंभीरता और बढ़ते जनदबाव को देखते हुए जिला कलेक्टर स्वयं मैदान में उतरे। पुलिस के आला अधिकारियों की मौजूदगी में पीड़ित पक्ष के प्रतिनिधिमंडल के साथ मैराथन वार्ता का दौर चला। इस उच्च स्तरीय बैठक में प्रशासन ने संवेदनशीलता दिखाते हुए परिजनों की प्रमुख मांगों को स्वीकार किया। जिला कलेक्टर ने आश्वासन दिया कि पीड़ित परिवार को उचित आर्थिक मुआवजा प्रदान किया जाएगा, परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी और नामजद आरोपियों की अविलंब गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाएगी। साथ ही, डरे हुए परिवार को भविष्य में पूर्ण सुरक्षा का वचन भी दिया गया।
प्रशासनिक स्तर पर मिले इस ठोस भरोसे के बाद, 48 घंटे से चला आ रहा धरना समाप्त हुआ। परिजनों ने भारी मन से पोस्टमार्टम की प्रक्रिया के लिए सहमति दी। औपचारिकताएं पूरी होने के बाद जब शंकर सिंह का पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव के लिए रवाना हुआ, तो वहां मौजूद हर आंख नम थी। यह घटना न केवल एक बेगुनाह की जान जाने का दुखद अध्याय है, बल्कि यह कानून व्यवस्था और समाज में पनपती उग्रता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। भीलवाड़ा में हुआ यह विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रतीक बना कि जब तक न्याय की दहलीज पर अंतिम व्यक्ति को सुरक्षा का अहसास नहीं होता, तब तक जन-आक्रोश की गूंज शांत नहीं होती।

Pratahkal Bureau
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