भीलवाड़ा: संत दिग्विजय राम ने नानी बाई का मायरा कथा में ईष्ट पर विश्वास का दिया संदेश
भीलवाड़ा के शम्भुपुरा में आयोजित तीन दिवसीय नानी बाई का मायरा कथा के प्रथम दिन शोभा यात्रा निकाली गई और संत दिग्विजय राम ने भक्त नरसी मेहता के जीवन प्रसंग सुनाए।

भीलवाड़ा के शम्भुपुरा गांव में आयोजित नानी बाई का मायरा कथा के दौरान रथ पर सवार राम स्नेही संप्रदाय के संत दिग्विजय राम जी महाराज।
भीलवाड़ा। राम स्नेही संप्रदाय के प्रख्यात संत दिग्विजय राम जी महाराज ने आध्यात्मिक उद्बोधन देते हुए कहा कि जीवन में अनुकूलता और प्रतिकूलता का चक्र निरंतर चलता रहता है, किंतु एक सच्चे साधक को सदैव अपने ईष्ट पर अटूट और पक्का विश्वास बनाए रखना चाहिए। श्री श्याम रंगीला बजरंग मित्र मंडल के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय 'नानी बाई का मायरा' कथा के प्रथम दिवस पर व्यास पीठ से रसामृतपान कराते हुए संत ने भक्तों को भक्ति मार्ग की महिमा से सराबोर किया।
ग्राम शम्भुपूरा में भक्तिमय माहौल के बीच आज कथा का विधिवत शुभारंभ हुआ। मंगलाचरण के पश्चात भगवान श्री शनि महाराज के मंदिर से एक भव्य शोभा यात्रा निकाली गई, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए उत्साहपूर्वक शामिल हुए। सिर पर मंगल कलश धारण किए महिलाएं शोभा यात्रा की दिव्यता बढ़ा रही थीं। जब यह भव्य जलूस शम्भुपूरा की गलियों से गुजरा, तो संपूर्ण ग्राम वृंदावन के स्वरूप में परिवर्तित नजर आया। शोभा यात्रा के दौरान रथ में सवार संत दिग्विजय राम का ग्रामवासियों ने पुष्प वर्षा कर भावभीना स्वागत किया, जिसके बाद यह यात्रा मुख्य कथा स्थल 'श्याम बगीची प्रांगण' पहुंची।
व्यास पीठ से कथा के प्रथम सोपान पर प्रकाश डालते हुए संत ने कहा कि कथाएं मूलतः दो प्रकार की होती हैं—पहली भगवान की कथा और दूसरी भक्त की कथा। भगवान की कथा को भक्त सुनते हैं, परंतु भक्त की कथा की महिमा इतनी निराली है कि उसे स्वयं भगवान बड़े चाव से सुनने आते हैं। उन्होंने कलयुग के महान भक्त नरसी मेहता का उदाहरण देते हुए बताया कि केवल भक्त नरसी के लिए भगवान को इस धरा पर 52 बार आना पड़ा। संत ने मार्मिक प्रसंग साझा करते हुए कहा कि ईश्वर अपने भक्तों की कठिन परीक्षा लेते हैं। जिस प्रकार एक कुशल नाविक की पहचान प्रतिकूल धारा में होती है, उसी प्रकार संकट के समय ही भक्त के विश्वास की परख होती है।
नरसी मेहता के जीवन संघर्ष पर चर्चा करते हुए संत ने बताया कि वह बचपन में न तो बोल सकते थे और न ही सुन सकते थे, परंतु संत कृपा और आशीर्वाद से उनकी वाणी प्रस्फुटित हुई। संत के मार्गदर्शन में ही नरसी जी ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें श्रीकृष्ण के दिव्य महारास के दर्शन कराए। उसी समय भगवान कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि जब भी वे 'केदारा राग' गाएंगे, प्रभु तत्काल उनके समक्ष प्रकट हो जाएंगे। इसके पश्चात नरसी जी ने अपनी समस्त संपत्ति का दान कर स्वयं को पूर्णतः भगवत भजन में समर्पित कर दिया।
संत दिग्विजय राम ने संसार की विडंबना पर कटाक्ष करते हुए कहा कि भगवान को प्रसन्न करना सरल है, किंतु संसार को संतुष्ट करना असंभव। अतः मनुष्य को ईश्वर से सांसारिक तुच्छ वस्तुएं मांगने के बजाय सदैव भक्ति की याचना करनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'नानी बाई का मायरा' वास्तव में भरोसे की कथा है, जो सिखाती है कि भरोसा संसार का नहीं, बल्कि केवल परमात्मा का करना चाहिए। सुख-दुख, लाभ-हानि और यश-अपयश व्यक्ति को उसके प्रारब्ध के अनुसार प्राप्त होते हैं, इसलिए विषम परिस्थितियों में भी धर्म और भक्ति का मार्ग नहीं त्यागना चाहिए। कथा के समापन पर भगवान श्याम बाबा की आरती की गई और उपस्थित जनसमूह में प्रसाद वितरण कर कार्यक्रम को विराम दिया गया।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
