भीलवाड़ा: मिडिल ईस्ट तनाव से सैंड स्टोन निर्यात ठप, संकट में पत्थर कारोबार
ईरान-इजराइल संघर्ष के कारण शिपिंग चार्ज बढ़ने और विदेशी ऑर्डर्स रुकने से उपरमाल क्षेत्र की पत्थर इकाइयों में कामकाज बंद होने के कगार पर है।

भीलवाड़ा के उपरमाल क्षेत्र में एक प्रोसेसिंग यूनिट में पत्थर की कटाई का कार्य, जो वर्तमान में निर्यात रुकने और बढ़ते शिपिंग खर्च के कारण मंदी की मार झेल रहा है।
भीलवाड़ा। मिडिल ईस्ट में गहराते तनाव और ईरान-इजराइल के बीच जारी युद्ध की विनाशकारी तपिश अब राजस्थान के विश्वप्रसिद्ध पत्थर कारोबार की दहलीज तक पहुँच गई है। उपरमाल क्षेत्र के सैंड स्टोन व्यापार पर इस वैश्विक संघर्ष का सीधा और घातक प्रहार हुआ है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह डगमगा गई है। विदेशी ऑर्डर्स के अचानक होल्ड होने और शिपिंग चार्जेस में हुई अप्रत्याशित बढ़ोतरी के कारण पत्थर का निर्यात पूरी तरह ठप पड़ गया है, जिसने खदान मालिकों से लेकर दिहाड़ी मजदूरों तक के बीच हड़कंप मचा दिया है।
सैंड स्टोन व्यवसायी देवनन्दन साहू ने व्यापारिक संकट की गहराई स्पष्ट करते हुए बताया कि यहाँ के सैंड स्टोन का अधिकांश निर्यात यूके, अमेरिका और मिडिल ईस्ट के देशों में होता है। वर्तमान युद्धजन्य परिस्थितियों ने इन देशों से मिलने वाले सभी पुराने ऑर्डर्स पर फिलहाल रोक लगा दी है। समुद्री मार्ग में असुरक्षा और लॉजिस्टिक्स की किल्लत के चलते माल ढुलाई की दरें आसमान छू रही हैं, जिससे तैयार माल विदेशों में नहीं जा पा रहा है। विवश होकर व्यापारियों को करोड़ों का स्टॉक स्थानीय स्तर पर ही जमा करना पड़ रहा है।
इस संकट का सबसे हृदयविदारक प्रभाव पत्थर प्रसंस्करण इकाइयों पर पड़ रहा है, जो अब बंद होने की कगार पर हैं। कई यूनिट्स ब्रेकडाउन की स्थिति में आ चुकी हैं और यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो इन पर ताले लटकना तय है। व्यवसायी साहू ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि काम ठप होने से मजदूर वर्ग का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया है। सैंड स्टोन का खनन कार्य वर्षा ऋतु में माइंस में बंद रहता है, अतः गर्मी के यही कुछ महीने मजदूरों की सालभर की कमाई का मुख्य आधार होते हैं।
भविष्य की अनिश्चितता से घिरे सैंड स्टोन उद्यमियों ने अब सरकार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से उम्मीदें लगा रखी हैं। व्यापारियों को भय है कि यदि मिडिल ईस्ट में जल्द शांति बहाल नहीं हुई, तो उपरमाल क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ पूरी तरह चरमरा जाएगी। हजारों परिवारों का भरण-पोषण इसी व्यवसाय पर टिका है। क्षेत्र के उद्यमियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस समस्या के शीघ्र समाधान की गुहार लगाई है ताकि निर्यात पुनः प्रारंभ हो सके और मजदूरों के पलायन को रोककर स्थानीय अर्थव्यवस्था को सुरक्षित किया जा सके।

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