भीलवाड़ा: पंचायतीराज कर्मचारियों का कलम डाउन आंदोलन, कामकाज प्रभावित
राजस्थान के भीलवाड़ा में पंचायतीराज मंत्रालयिक कर्मचारियों का आंदोलन तेज हो गया है। अपनी लंबित मांगों को लेकर 10 से 16 जून तक आधे दिन के कार्य बहिष्कार का ऐलान करते हुए कर्मचारियों ने सरकार को चेतावनी दी है। क्या झुकेगी सरकार?

भीलवाड़ा। अपनी विभिन्न लंबित मांगों को लेकर राजस्थान के पंचायतीराज विभाग के मंत्रालयिक कर्मचारियों का संघर्ष अब नए चरण में प्रवेश कर गया है। गत 1 जून 2026 से जारी आंदोलन को और अधिक प्रभावी बनाते हुए कर्मचारियों ने रणनीति में बदलाव किया है। अब 10 से 16 जून तक प्रदेशभर के पंचायतीराज मंत्रालयिक कर्मचारी प्रतिदिन आधा दिन 'कलम डाउन' यानी कार्य बहिष्कार करेंगे, जिससे सरकारी कामकाज प्रभावित होने की संभावना है।
आंदोलन की इस कड़ी में मंगलवार को प्रदेश प्रतिनिधि अशोक कुमार वैष्णव के नेतृत्व में मंत्रालयिक कर्मचारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने जिला कलेक्टर और जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) से मुलाकात की। इस दौरान मुख्यमंत्री के नाम संबोधित एक ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें सरकार को अपनी मांगों को लेकर पुनः चेताया गया है। ज्ञापन सौंपने के दौरान कर्मचारियों ने एक स्वर में अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया और सरकार से अविलंब सार्थक वार्ता करने की मांग की।
इस प्रदर्शन में जिला अध्यक्ष शोभा लाल तेली, पवन शर्मा, प्रमोद जैन, भानु प्रकाश, कन्हैया लाल कुमावत, सियाराम पारीक, विजेंद्र सिंह, नारायण तेली, प्रहलाद सुथार, चेतन व्यास, अनिल जैन, सोमेंद्र सिंह, राधेश्याम वैष्णव, शिवदयाल जाट, मनोज शर्मा, जयकिशन पारीक, भैरू लाल खटीक, गिरिराज व्यास, अभिषेक न्याती, मनीष भट्ट, कमलेश सुवालका, डालचंद रेगर, नाना लाल अहीर, मुकेश पारीक, राधेश्याम अहीर, हरिशंकर तेली, नाना लाल धाकड़, फूलचंद रेगर, रामलाल सुथार, प्रकाश वैष्णव, रतन गुर्जर, भगवती प्रसाद सुवालका, सवाई राम, कैलाश राव, नंदकिशोर चारण, भागचंद गुर्जर, मैना चौधरी, सुमन पारीक, भगवती शर्मा, दीक्षा मीणा, आशा जैन, सीता मीणा, सुमन टेलर एवं सुशीला योगी सहित लगभग 410 मंत्रालयिक कर्मचारी उपस्थित रहे।
कर्मचारी संघ के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि उनकी उपेक्षा अब और अधिक सहन नहीं की जाएगी। यदि सरकार ने निर्धारित समय सीमा के भीतर उनकी वाजिब मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो आने वाले दिनों में आंदोलन और अधिक उग्र होगा, जिसकी समस्त जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी। यह आंदोलन अब केवल मांग तक सीमित न रहकर कर्मचारी एकता और सरकार की कार्यप्रणाली के प्रति असंतोष का प्रतीक बन गया है।

