भगवान ने धरा नरसी का रूप, भीलवाड़ा में नानी बाई रो मायरो कथा आयोजित
भीलवाड़ा के कमला विहार में महोत्सव के दूसरे दिन कथा वाचिका दीपा दाधीच ने नरसी मेहता के जीवन प्रसंगों और ठाकुर जी की सहायता का सजीव चित्रण किया।

भीलवाड़ा। "सच्चे मन से याद करने पर भगवान भक्त की सहायता करने अवश्य आते हैं," इसी अटूट विश्वास और भक्ति के रस में सराबोर नानी बाई रो मायरो महोत्सव का भव्य आयोजन भीलवाड़ा के कमला विहार स्थित राधाकृष्ण मंदिर पार्क में किया जा रहा है। नानी बाई रो मायरो महोत्सव सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित इस कथा के दूसरे दिन राष्ट्रीय कथा वाचिका सुश्री दीपा दाधीच ने भक्त शिरोमणि नरसी मेहता के जीवन के उन प्रसंगों का सजीव वर्णन किया, जिन्होंने उपस्थित जनसमुदाय को भाव-विभोर कर दिया। समिति संयोजक रमेशचन्द्र दाधीच ने बताया कि कथा के दौरान भगवान के भक्तवत्सल रूप और नरसी मेहता की अनन्य भक्ति की महिमा का बखान किया गया।
कथा की शुरुआत में सुश्री दीपा दाधीच ने नरसी मेहता के गांव तलाजा के उस प्रसंग को सुनाया जब उनकी हुंडी का पता चलने पर लोगों ने उन्हें जादूगर तक कह दिया था। इसी बीच भवानी नामक एक मशकरे ने नरसी मेहता को अपमानित करने के षड्यंत्र के तहत पूरे गांव को उनके पिता के श्राद्ध पर सपरिवार भोजन का निमंत्रण दे दिया। अचानक उमड़ी भीड़ देख नरसी मेहता व्याकुल हो उठे और वे नगर सेठ के पास पहुंचे। वहां उन्होंने अपनी अनमोल 'केदारों राग' को गिरवी रखकर कुछ धन प्राप्त किया ताकि वे भोजन सामग्री जुटा सकें। परंतु, जब वे सामग्री लेकर घर पहुंचे तो यह देखकर चकित रह गए कि साक्षात ठाकुर जी ने नरसी मेहता का रूप धारण कर पूरे गांव को पहले ही तृप्त कर दिया था।
घटनाक्रम में नया मोड़ तब आया जब भवानी मशकरे ने राव मंडली के राजा को नरसी के विरुद्ध भड़काया। राजा ने नरसी को बंदी बना लिया और चुनौती दी कि यदि 24 घंटे के भीतर ठाकुर जी के गले की माला नरसी के गले में नहीं आई तो उन्हें कठोर दंड दिया जाएगा। अपने भक्त को संकट में देख भगवान पुनः सक्रिय हुए। उन्होंने स्वयं नरसी का रूप धरकर नगर सेठ को उधार चुकाया और 'केदारों राग' मुक्त कराई। इतना ही नहीं, भगवान ने राजा की पत्नी का रूप धारण कर नरसी को जल पिलाने का प्रयास किया, किंतु अनन्य भक्त नरसी ने प्रतिज्ञा की कि जब तक सांवरिया नहीं आएंगे, वे जल ग्रहण नहीं करेंगे। अंततः भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और नरसी मेहता द्वारा केदारों राग गाते ही ठाकुर जी की माला स्वतः उनके गले में आ गई, जिससे विवश होकर राजा को उन्हें ससम्मान छोड़ना पड़ा।
कथा के अगले पड़ाव में अंजार नगर में नरसी जी की दोहिती के विवाह का प्रसंग आया। श्रीरंग जी द्वारा भेजी गई मायरे की पत्रिका और कोकलिया जी महाराज के साथ आई लिस्ट को पढ़कर नरसी मेहता हर्षित हो उठे। अपने 16 संतों के साथ मायरे की तैयारी कर निकले नरसी की राह तब आसान हुई जब भगवान कृष्ण ने 'खाती' का रूप धारण कर उनकी टूटी गाड़ी सुधारी और उन्हें अंजार पहुंचाया। इस अवसर पर "म्हारी गाड़ी सुधारो दीनानाथ घणी दूर से दौड़े आयो" जैसे भजनों पर भक्त झूम उठे। कथा में देवीलाल कुमावत द्वारा प्रस्तुत सजीव झांकियां आकर्षण का केंद्र रहीं। इस धार्मिक अनुष्ठान में आयोजक रामचन्द्र व्यास सहित शिव मंदिर सेवा समिति गुलाबपुरा के पदाधिकारी फतेहलाल कांठेड़, प्रमोद कुमार आचार्य, रामचन्द्र मून्दड़ा, रामपाल शर्मा, कृष्ण सिंह राजावत, इन्द्रा शर्मा, कोमल पाराशर, रेखा जैन एवं दाधीच परिवार के कौशल्या, अभिषेक, पंकज, अक्षय, गोपाल, सत्यनारायण, राधेश्याम, अजय, मुरली, दिनेश, हीरालाल ओझा, चन्द्रप्रकाश व अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। आरती और भोग के पश्चात भक्तों में प्रसाद वितरण के साथ दूसरे दिन की कथा का समापन हुआ।

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