भीलवाड़ा में शिव-सती विवाह की पावन कथा से गूंजा शिवमहापुराण का पांडाल
भीलवाड़ा के हरिशेवा उदासीन आश्रम में पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में आयोजित शिवमहापुराण कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।

भीलवाड़ा के हरिशेवा उदासीन आश्रम में पुरुषोत्तम मास के पावन उपलक्ष्य में आयोजित श्री शिवमहापुराण कथा के चौथे दिन एक अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण का सृजन हुआ। महामंडलेश्वर स्वामी श्री हंसराम जी उदासीन महाराज के सान्निध्य में कथा प्रवक्ता डॉ. स्वामी निर्मल दास जी महाराज ने भगवान शिव और माता सती के दिव्य विवाह प्रसंग का अत्यंत मनोहारी वर्णन किया। कथा का आरंभ सामूहिक "ॐ नमः शिवाय" के मंत्रोच्चार से हुआ, जिससे संपूर्ण सभागार भक्तिरस में निमग्न हो गया।
व्यासपीठ से डॉ. स्वामी निर्मल दास जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि परमात्मा की भक्ति में समर्पित जीवन ही मनुष्य के लिए सार्थकता का एकमात्र मार्ग है। उन्होंने राग-द्वेष और अहंकार को त्यागकर सत्संग और निरंतर ईश्वर स्मरण को जीवन की वास्तविक कला बताया। महाराजश्री ने "भवानीशंकरौ वन्दे" श्लोक के माध्यम से समझाया कि श्रद्धा और विश्वास के बिना ईश्वर का साक्षात्कार असंभव है। कथा के दौरान माता सती के त्याग, समर्पण और पतिव्रता धर्म की महिमा का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि शिव और शक्ति का मिलन केवल विवाह नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के संतुलन और ऊर्जा का आधार है।
जैसे ही भगवान शिव की दिव्य बारात और विवाह महोत्सव का प्रसंग आया, कथा पांडाल "हर-हर महादेव", "बोल बम" और "ॐ नमः शिवाय" के जयघोषों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन के माध्यम से अपनी श्रद्धा प्रकट की। महाराजश्री ने स्पष्ट किया कि अहंकार का परित्याग और ईश्वर के प्रति शरणागति ही कल्याण का एकमात्र साधन है। कथा का समापन आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ। आश्रम के संतों ने जानकारी दी कि पुरुषोत्तम मास के अंतर्गत प्रतिदिन प्रातःकालीन विष्णु यज्ञ, रुद्राभिषेक और सायंकालीन भव्य गंगा आरती व अखंड रामधुन जैसे धार्मिक अनुष्ठान जारी रहेंगे। यह आयोजन न केवल आध्यात्मिक चेतना का संचार कर रहा है, बल्कि समाज में सदाचार और संयम की स्थापना के लिए भी प्रेरित कर रहा है।

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