भीलवाड़ा: हरिशेवा आश्रम में भागवत कथा के पांचवें दिन छप्पन भोग अर्पित
पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर स्वामी अशोकानंद महाराज ने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया, विष्णु यज्ञ और रुद्राभिषेक में जुटे श्रद्धालु।

भीलवाड़ा के हरिशेवा उदासीन आश्रम में पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन व्यासपीठ के सम्मुख बैठकर कथा श्रवण करते संतगण और उपस्थित श्रद्धालु।
हरिशेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर में पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस पर आध्यात्मिक त्रिवेणी का अनुपम संगम देखने को मिला। सनातन सेवा समिति और महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी उदासीन महाराज के पावन सानिध्य में आयोजित इस भव्य धार्मिक महोत्सव के दौरान कथाव्यास पूज्य स्वामी अशोकानंद जी महाराज (जबलपुर) ने भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य अवतरण, गोकुल आगमन तथा उनकी मनोहारी बाल लीलाओं का अत्यंत रसपूर्ण एवं दिव्य वर्णन किया। स्वामी जी के मुखारविंद से प्रवाहित इस रसधारा को श्रवण कर उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और संपूर्ण आश्रम परिसर पूर्णतः कृष्णमय वातावरण में सराबोर हो गया।
कथाव्यास स्वामी अशोकानंद जी महाराज ने पूतना उद्धार, शकटासुर वध, तृणावर्त संहार, माखन चोरी, ऊखल बंधन तथा यमलार्जुन मोक्ष जैसे अलौकिक प्रसंगों का विस्तृत विवेचन करते हुए प्रतिपादित किया कि भगवान की प्रत्येक लीला में जीवों के कल्याण की भावना ही अंतर्निहित है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने बाल्यावस्था में ही महापराक्रमी असुरों का विनाश कर वसुंधरा पर धर्म की पुनः स्थापना की तथा अनन्य भक्तों की रक्षा का अमर संदेश दिया। भगवान की ये बाल लीलाएं केवल सामान्य मनोरंजन मात्र नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन को सत्य, प्रेम, करुणा और भक्ति के परम मार्ग पर अग्रसर होने की वास्तविक प्रेरणा प्रदान करती हैं। कथा के दौरान उन्होंने श्रीमद्भागवत महापुराण का सुप्रसिद्ध श्लोक “कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्” सुनाते हुए स्पष्ट किया कि समस्त अवतारों में भगवान श्रीकृष्ण ही स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं।
परमात्मा की असीम करुणा का शास्त्रीय वर्णन करते हुए स्वामी जी ने श्लोक उद्धृत किया— “श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥” उन्होंने समझाया कि भगवान विष्णु का श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरण सेवा, अर्चन, वंदन, दास्य भाव, सख्य भाव एवं आत्मसमर्पण ही नवधा भक्ति के नौ प्रमुख स्वरूप हैं, जिनके सच्चे पालन से मनुष्य सुगमतापूर्वक परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। महाराज जी ने बल देकर कहा कि पुरुषोत्तम मास मुख्य रूप से आत्मचिंतन, साधना, दान, जप, तप एवं सत्संग का एक परम पावन और विशेष अवसर है, जिसमें भगवान के नाम का निरंतर स्मरण करने से मानव को अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है तथा उसके जीवन में सुख, शांति एवं आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
कथा की पूर्णाहुति के उपरांत भगवान श्रीकृष्ण को अटूट श्रद्धा एवं परम भक्ति भाव के साथ छप्पन भोग अर्पित किया गया। मंदिर परिसर में अत्यंत आकर्षक और भव्य रूप से सजाए गए इस छप्पन भोग में विभिन्न प्रकार के उत्तम मिष्ठान्न, फल, मेवा, पेय पदार्थ एवं अनेक पारंपरिक व्यंजन भगवान के सम्मुख समर्पित किए गए। छप्पन भोग के इस अनुपम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे, जिन्होंने भगवान के गगनभेदी जयकारों एवं मधुर भजनों के मध्य दिव्य महाआरती में भाग लिया तथा श्रद्धापूर्वक महाप्रसाद ग्रहण किया।
इस अवसर पर आश्रम परिसर संपूर्ण भक्तिमय उल्लास और सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण नजर आया। कथा के समानांतर आयोजित भव्य विष्णु यज्ञ में आज मुख्य यजमान गोविन्दलाल-मंजू देवी गोहिल तथा विजय कुमार-नीलू गोहिल ने सपरिवार जोड़े सहित पूर्ण आहुतियां अर्पित कीं तथा भगवान देवाधिदेव महादेव का विधि-विधान से रुद्राभिषेक संपन्न किया। आश्रम के पूज्य संत मायाराम एवं संत गोविन्दराम ने श्रद्धालुओं से पुरुषोत्तम मास के दौरान भीलवाड़ा की पावन धरा पर प्रवाहित हो रही धर्म, भक्ति एवं सत्संग की इस त्रिवेणी का अधिकाधिक लाभ उठाने का भावपूर्ण आह्वान किया। इस भव्य धार्मिक समागम के अवसर पर संत राजाराम, संत ईशानराम, संत सुयज्ञराम सहित बहुत बड़ी संख्या में स्थानीय एवं दूर-दराज से आए श्रद्धालुगण गरिमामयी रूप से उपस्थित रहे और कथा के समापन पर महाआरती एवं व्यापक स्तर पर प्रसाद का वितरण सुनिश्चित किया गया।

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