भीलवाड़ा के हरि शेवा उदासीन आश्रम, सनातन मंदिर में पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में आयोजित एक माह की आध्यात्मिक साधनाओं और सेवा प्रकल्पों का भव्य समापन अत्यंत श्रद्धा और भक्तिमय वातावरण में संपन्न हुआ। यह मासव्यापी आयोजन संत समागम, विष्णु यज्ञ की पूर्णाहुति, रुद्राभिषेक और गंगा आरती के साथ अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचा, जिसमें देशभर के प्रबुद्ध संत-महात्माओं और श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रातःकाल पवित्र जलस्रोतों से आए जल से निर्मित सरोवर में संतों के स्नान के साथ हुई, जिसके उपरांत वैदिक आचार्यों के सानिध्य में विष्णु यज्ञ संपन्न हुआ और अभिजीत मुहूर्त में पूर्णाहुति दी गई। इस अवसर पर हरि सिद्धेश्वर महादेव का विधि-विधान से रुद्राभिषेक किया गया, जिसमें 33 कोटि देवी-देवताओं का आह्वान और अमावस्या तर्पण जैसे महत्वपूर्ण वैदिक अनुष्ठान सम्मिलित रहे।

अपराह्न में आयोजित संत समागम में आश्रम के महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी उदासीन महाराज ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में सेवा और सिमरन को जीवन की सर्वोत्तम साधना बताया। उन्होंने कहा कि संतों का सानिध्य ही सत्संग का वास्तविक स्वरूप है और मानव जीवन का उद्देश्य निरंतर परमात्मा का स्मरण करते हुए राष्ट्र एवं समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करना है। स्वामी जी ने रामनाम की शक्ति पर बल देते हुए इसे समाज को जोड़ने का सशक्त माध्यम निरूपित किया। उन्होंने पुरुषोत्तम मास के दौरान आश्रम में आयोजित श्री राम कथा, शिव महापुराण, गीता पाठ और अखंड रामनाम संकीर्तन जैसे विविध अनुष्ठानों का उल्लेख करते हुए सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। कार्यक्रम में काशी के प्रखर वक्ता डॉ. स्वामी निर्मल दास जी महाराज सहित अनेक विशिष्ट संतों ने अपने आशीर्वचन प्रदान किए और आश्रम को आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख केंद्र बताया।

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित भीलवाड़ा सांसद दामोदर अग्रवाल और शहर विधायक अशोक कुमार कोठारी ने कार्यक्रम की गरिमा को रेखांकित करते हुए इसे सनातन संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। संध्याकाल में आयोजित भव्य गंगा आरती ने वातावरण को भक्ति के रंग में सराबोर कर दिया, जहाँ मंत्रोच्चार और रामधुनी से पूरा आश्रम परिसर गुंजायमान हो उठा। निंबार्क आश्रम के महंत मोहन शरण शास्त्री द्वारा संचालित इस कार्यक्रम का समापन विप्र पूजन, संत सम्मान और महाप्रसादी के वितरण के साथ हुआ। यह आध्यात्मिक महाकुंभ न केवल धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्णाहुति का प्रतीक बना, बल्कि जनमानस में सेवा, संस्कार और राष्ट्र प्रेम का संकल्प जागृत कर एक अमिट प्रभाव छोड़ गया।

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