भीलवाड़ा। रेगिस्तानी हवाओं और कड़ाके की सर्दी के बीच भीलवाड़ा का काशीपुरी धाम रविवार को भक्ति के एक ऐसे ज्वार का साक्षी बना, जिसने आस्था की नई परिभाषा लिख दी। षटतिला एकादशी और मकर संक्रांति के दुर्लभ संयोग पर श्री श्याम मंदिर काशीपुरी धाम में श्रद्धालुओं का ऐसा हुजूम उमड़ा कि मंदिर परिसर छोटा नजर आने लगा। सुबह की पहली किरण के साथ ही बाबा श्याम के दर्शनों के लिए भक्तों की लंबी कतारें लग गईं, जो देर शाम तक अटूट बनी रहीं। हवाओं में गूंजते "जय श्री श्याम" के जयकारों और शंखनाद ने पूरे वातावरण को अलौकिक दिव्यता से सराबोर कर दिया।

इस पावन पर्व के उपलक्ष्य में संपूर्ण मंदिर परिसर को दूधिया रोशनी और फूलों की भव्य सजावट से महकाया गया। गर्भगृह में विराजित बाबा श्याम का विशेष और नयनाभिराम श्रृंगार किया गया, जिसकी छटा देखते ही बन रही थी। मंदिर के मुख्य पुजारी रूपेंद्र शुक्ला एवं रवि पंडित द्वारा वैदिक रीति-रिवाजों के साथ पूजन संपन्न कराया गया। मंत्रोच्चार की ध्वनि और धूप-दीप की सुगंध ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। आस्था का आलम यह था कि शून्य के करीब पहुंचते तापमान के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह चरम पर था और कई भक्त बाबा की चौखट पर नतमस्तक होकर भावुक होते दिखाई दिए।

धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए मंदिर अध्यक्ष सुरेश पौधार ने बताया कि इस वर्ष षटतिला एकादशी का संयोग अत्यंत फलदायी है। शास्त्रों की मान्यता के अनुसार इस दिन तिल का छह प्रकार से उपयोग—स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, भोजन और दान—मनुष्य के संचित पापों का क्षय कर सुख-समृद्धि के द्वार खोलता है। इसके साथ ही मकर संक्रांति के पुण्यकाल में सूर्य के उत्तरायण होने से इस दिन किए गए दान का महत्व अनंत गुना बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि बाबा श्याम के चरणों में हाजिरी लगाने मात्र से भक्तों के कष्टों का निवारण होता है। श्रद्धालुओं ने पुण्य लाभ के लिए तिल, गुड़, अन्न और वस्त्रों का मुक्त हस्त से दान किया।

भीड़ के प्रबंधन और दर्शनार्थियों की सुगमता के लिए मंदिर प्रबंधन द्वारा चाक-चौबंद व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गईं। सेवाभावी कार्यकर्ताओं ने अनुशासित तरीके से भक्तों को कतारबद्ध करवाकर सुचारू दर्शन लाभ दिलाने में महती भूमिका निभाई। काशीपुरी धाम का यह आयोजन न केवल धार्मिक अनुष्ठान रहा, बल्कि इसने सेवा और समर्पण की उस अटूट परंपरा को भी जीवंत किया, जो सदियों से सनातन संस्कृति का आधार रही है। भक्ति और आस्था का यह महासंगम भीलवाड़ा के धार्मिक इतिहास में एक और स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है।

Pratahkal Bureau

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