भीलवाड़ा चातुर्मास सत्संग में आचार्य रामदयालजी महाराज बोले, कृष्ण जैसा जगद्गुरु और अर्जुन जैसा सद्शिष्य नहीं
भीलवाड़ा के माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में चातुर्मास सत्संग के दौरान आचार्य रामदयालजी महाराज ने आत्मज्ञान, राम नाम और सद्गुरु के महत्व पर महत्वपूर्ण संदेश दिया।

तस्वीर में माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आयोजित सत्संग के दौरान मंच पर प्रवचन देते हुए आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज और अन्य संतगण नजर आ रहे हैं।
माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आयोजित “विश्व शांति कल्याण” चातुर्मास के तहत गुरुवार को आयोजित दैनिक सत्संग में अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगतगुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने आत्मज्ञान, राम नाम की महिमा और सद्गुरु के महत्व पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अपने ज्ञान के द्वारा ही अपने अज्ञान का अंत करना होगा। गंगा में गोते लगाने से पाप समाप्त हो जाएगा और केवल सत्संग में आने से स्वयं को पुण्यशाली मान लेना सबसे बड़ा अज्ञान है। जिस दिन सत्संग हृदय में उतर जाएगा, उसी दिन पुण्य का द्वार स्वतः खुल जाएगा।
आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने कहा कि भगवान योगेश्वर कृष्ण ने गीता को निमित्त बनाकर जगत के अर्जुनों की आंखें खोलीं। उन्होंने कहा कि संसार में कृष्ण जैसा कोई जगद्गुरु नहीं और अर्जुन जैसा कोई सद्शिष्य नहीं है। जीवन में आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए आत्मजागृति आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने निज स्वरूप से आत्मतत्व की पहचान करनी चाहिए और स्वयं के माध्यम से स्वयं का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
राम नाम की महिमा का उल्लेख करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि जीवन की सभी उपलब्धियां राम के द्वारा ही संभव होती हैं। उन्होंने कहा कि कामना और निष्कामना दोनों में राम का होना आवश्यक है। संसार, अर्थ, धर्म और भक्ति, सब कुछ राम के साथ होना चाहिए। यदि भगवान और भगवान का नाम साथ हो तो नरक भी नरक नहीं रह जाता। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि दुःख के समय परमात्मा ही क्यों स्मरण आते हैं। अनुभवी संतों का अंतस्थल कहता है कि दुःख, वंदना, कष्ट, टीस और अभाव परमात्मा के विलक्षण सकारात्मक हस्ताक्षर हैं। उन्होंने कहा कि परमात्मा सुख का सागर हैं और उनके नाम के सुमिरन जैसा सुख दूसरा नहीं हो सकता। यदि मृत्यु भी आए तो सुमिरन के साथ आए ताकि पुनर्जन्म न हो। उन्होंने कहा कि जैसे जीना एक कला है, वैसे ही मरना भी याद होना चाहिए।
आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि जीवन में उठना, बैठना, हंसना और रोना, सब कुछ सद्गुरु से ही सीखा जाता है। उन्होंने कहा कि दूसरों की हंसी उड़ाना विवाद और लड़ाई का कारण बन सकता है, लेकिन यदि नारायण और गुरुदेव को देखकर मुस्कुराएंगे तो वह भी प्रसन्न होंगे और स्वयं भी आनंदित रहेंगे। उन्होंने कहा कि वही सद्गुरु है जो निज रूप, नाम और निर्वाण के साथ शिष्य का सृजन करता है तथा मुक्ति का मार्ग भी बताता है। ऐसे सद्गुरु पर संसार के असंतोष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
उन्होंने कहा कि शिष्य के जीवन से अज्ञान का अंधकार मिटाने वाला ही सद्गुरु होता है। ज्ञान वही है जो अज्ञान को ललकारता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि संसार का नहीं, बल्कि संसार बनाने वाले का ध्यान करना चाहिए, क्योंकि वास्तविक कल्याण वही करेगा।
आचार्यश्री के प्रवचन से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन किया। इस दौरान अनेक श्रद्धालुओं ने भजनों की प्रस्तुति भी दी। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती उतारी। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन सुबह 9 बजे से 10 बजे तक सत्संग का आयोजन किया जा रहा है, जबकि सुबह 8:30 बजे से 9 बजे तक रामधुनी के साथ वाणीजी का पाठ हो रहा है। सूर्यास्त के समय आयोजित संध्या आरती में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

Anshul Toshniwal, Bhilwara
नाम: अंशुल तोषनीवाल
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परिचय
अंशुल तोषनीवाल भीलवाड़ा जिले से न्यूज़ वेबसाइट के लिए रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं। वह भीलवाड़ा जिले और उसके अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों की स्थानीय घटनाओं, प्रशासनिक गतिविधियों, क्राइम, राजनीति और जनहित से जुड़ी सभी प्रकार की खबरों को नियमित रूप से कवर करते हैं।
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अंशुल तोषनीवाल शैक्षणिक रूप से इंजीनियर (Engineer) हैं। उनकी तकनीकी और विश्लेषणात्मक पृष्ठभूमि उन्हें खबरों को सटीकता से समझने और प्रस्तुत करने में मदद करती है।
