भीलवाड़ा, 12 अगस्त। अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगतगुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने कहा कि जैसी हमारी दृष्टि होगी, वैसी ही हमें सृष्टि नजर आएगी। माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास के तहत बुधवार को आयोजित दैनिक सत्संग में उन्होंने दृष्टि, साधना और प्रभु के स्वरूप को लेकर श्रद्धालुओं को संबोधित किया।

आचार्यश्री ने कहा कि युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों एक ही गुरु के शिष्य थे, लेकिन दृष्टि के भेद के कारण युधिष्ठिर की दृष्टि में दुनिया में कोई दुर्जन नहीं था, जबकि दुर्योधन की दृष्टि में कोई सज्जन या धर्मात्मा नहीं था। एक की नजर में कहीं भी अच्छाई नहीं थी तो दूसरे की नजर में कहीं भी बुराई नहीं थी। उन्होंने कहा कि हमारे भीतर भी दोष आ गया है और दृष्टि कमी देखने वाली हो रही है, जबकि हमें अच्छाई और गुणों पर नजर रखनी चाहिए।



उन्होंने कहा कि गुरु से शिष्य की कोई बात या स्वभाव छुपा नहीं रहता है। वह गुरु ही क्या जो किसी शिष्य को अपनी आज्ञा में नहीं रख सके। इस धरती पर परमात्मा डायरेक्टर हैं और हम सब एक्टर हैं। वह हमसे अभिनय कराते हैं और हम करते जाते हैं।

आचार्यश्री ने कहा कि परमात्मा को कोई साकार, कोई निराकार तो कोई-कोई बेकार भी कह देता है। जो साकार कहते हैं, वे सगुण उपासक और जो निराकार कहते हैं, वे निर्गुण उपासक हो गए। बेकार कहने वाले नास्तिक हो गए। उन्होंने कहा कि निर्गुण या सगुण सब छोड़ राम नाम भजन कर जीवन को पावन और सुंदर बनाओ। प्रभु का नाम निर्गुण-सगुण विवाद के लिए नहीं, बल्कि साधना के लिए है। हमारी साधना श्रेष्ठ है तो भक्त एक दिन मंदिर जाकर भगवान बन गया, जबकि इंसान रोज मंदिर जाकर भी पत्थर से बदतर हो गया।

उन्होंने कहा कि हमारी कल्पना के अनुसार हमें सब कुछ मिलता है। परमात्मा के बारे में जैसी हमारी कल्पना होती है, वैसी ही छवि नजर आती है। भक्त अपनी भावना के अनुरूप भगवान का श्रृंगार करता है। भगवान की जो छवि एक बार आंखों में बस जाए, वह बदल नहीं सकती।

आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि भगवान जैसी जरूरत होती है, वैसा ही रूप बना सकते हैं। कृष्ण ने जहां जरूरत थी, वहां प्रेमियों के लिए बंशी बजाई, लेकिन वह जानते थे कि अज्ञानी, अहंकारी और उपद्रवी कभी बंशी की भाषा स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए हाथ में सुदर्शन चक्र लेकर राष्ट्रद्रोहियों के छक्के भी छुड़ाने का कार्य बंशीवाले ने किया।

उन्होंने कहा कि बिना कारण संसार में कोई भी कार्य नहीं होता है। सत्संग में आए हैं तो उसके पीछे भी कारण है। सत्संग में बैठने से आधे मोक्ष की ओर और सत्संग पूरी तरह हृदय में उतर जाए तो पूरा मोक्ष प्राप्त हो सकता है।

आचार्य रामदयालजी महाराज से पूर्व अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन किया। कुछ श्रद्धालुओं ने भजन की प्रस्तुति भी दी। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं द्वारा आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की गई।

सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। चातुर्मास में दैनिक सत्संग का समय सुबह 9 से 10 बजे तक है। रामधुनी के साथ सुबह 8.30 से 9 बजे तक वाणीजी का पाठ हो रहा है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती तथा रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

Pratahkal Newsroom

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