मणिक्यनगर रामद्वारा धाम में चल रहे ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत रविवार को आयोजित दैनिक सत्संग में अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने वाणी संयम, ज्ञान और परमात्मा से मित्रता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि कभी भी मनमर्जी से नहीं बोलना चाहिए, क्योंकि अज्ञान और नादानी में निकलने वाली भाषा का परिणाम ठीक नहीं होता।

आचार्यश्री ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने उन्हें और उनकी मां को गाली देने वाले बच्चों को माफ तो कर दिया, लेकिन उन्होंने यह वेदना भी व्यक्त की है कि जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया गया, वह भारतीय संस्कृति की भाषा नहीं है। उन्होंने कहा कि संसार में अज्ञान का शिकार व्यक्ति कभी-कभी सर्वशक्तिमान ईश्वर को भी माफ नहीं करता और उसे भी भला-बुरा कह देता है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रद्रोही, धर्मद्रोही, संस्कृतिद्रोही और गुरूद्रोही का साथ देने के लिए अज्ञानी मन पता नहीं क्यों तैयार हो जाता है। जब परिणाम भुगतने पड़ते हैं तो व्यक्ति कहता है कि वह मन के अनुसार चला, बोला और सोचा, इसलिए अब उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। ज्ञानीजन कहते हैं कि ऐसे प्राणी भवसागर में डूब जाते हैं, उन्हें कोई पार नहीं लगा सकता।







आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि जीव अपने दुखों के लिए अज्ञान और अविद्या के कारण कभी कर्मों को, कभी समय को और कभी परमात्मा को दोष देता है, जबकि सुख-दुःख उसके कर्मों की गाथा होते हैं। ईश्वर को कोसने से कुछ नहीं बदलता। अपने स्वार्थ की पूर्ति नहीं होने पर व्यक्ति सुख-दुःख का कारण गुरू को मान बैठता है। गुरू की आज्ञा और शासन का भय नहीं रखने वाले परिणाम भुगतते हैं और आगे भी भुगतना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि जीवन में मन के अनुकूल चलने की बजाय गुरू, शास्त्र और परमात्मा के अनुकूल चलना चाहिए। वह व्यक्ति अज्ञानी होता है जिसे स्वयं में खूबियां और दूसरों में कमियां दिखाई देती हैं। उन्होंने कहा कि राम और गुरू कभी बुरा नहीं करते, लेकिन उनके जीवन के प्रति बुरा सोचने वाले भी होते हैं। माता-पिता कभी बुरा नहीं करते, लेकिन कई लोग उनमें भी बुराई खोज लेते हैं।

स्वामीजी ने कहा कि स्वार्थ पूरा नहीं होने पर व्यक्ति के लिए ईश्वर भी शैतान हो जाता है और स्वार्थ पूरा हो जाए तो शैतान भी ईश्वर नजर आने लगता है। उन्होंने वाणीजी में चिंतन देते हुए कहा कि गुरू आज्ञा में विश्वास रखने वाला परमात्मा से साक्षात्कार कर सकता है।

मित्रता दिवस के अवसर पर संदेश देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि पूरे संसार को मित्र भाव से देखना चाहिए और किसी के प्रति शत्रुता के विचार नहीं रखने चाहिए। उन्होंने कहा कि संसारिक लोगों से मित्रता करने पर स्वार्थ पूरा नहीं होने की स्थिति में मित्रता कब शत्रुता में बदल जाए, कहा नहीं जा सकता, लेकिन परमात्मा से अच्छा मित्र कोई नहीं है, जो जन्म से लेकर मरण तक साथ निभाता है।

उन्होंने कहा कि परमात्मा से मित्रता करने वाला धन्य हो जाता है। सारा जगत कृष्ण के लिए रोया, लेकिन कृष्ण अपने मित्र सुदामा के लिए रोए। परमात्मा की आंखों में जिसके लिए आंसू आ जाएं, वह भाग्यशाली होता है। राम ने सुग्रीव से मित्रता निभाई तो इतिहास बन गया।

आचार्यश्री ने कहा कि मित्रता दिवस किसी एक दिन विशेष तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे प्रतिदिन मनाना चाहिए। सच्चा मित्र वही होता है जो मित्र को कुपथ से सुपथ पर ले आए और उसके जीवन की सभी बुराइयों को समाप्त कर दे। उन्होंने परमात्मा और गुरू को अपना मित्र बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि वे मार्गदर्शन देकर जीवन को सार्थक बनाते हैं।

आचार्यश्री से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन दिया। प्रवचन के विश्राम के बाद श्रद्धालुओं द्वारा आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की गई। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

चातुर्मास के दौरान दैनिक सत्संग का समय सुबह 9 से 10 बजे तक निर्धारित है। रामधुनी के साथ सुबह 8.30 से 9 बजे तक वाणीजी का पाठ हो रहा है। वहीं सूर्यास्त के समय आयोजित संध्या आरती में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

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