सुख-दुःख सबके जीवन में आते हैं, पर जो हर परिस्थिति में मुस्कराता है, भगवान वहीं बन पाता है।” आचार्य पुलकसागर महाराज ने बुधवार को शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान यह विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी बातों पर लड़ते रहेंगे तो अनंत सुख की प्राप्ति कैसे होगी। मनुष्य को अपने स्वभाव में सुखी रहना चाहिए और नियम कर लेना चाहिए कि पास में कुछ हो या न हो, लेकिन दुःख को अपने पास नहीं आने देंगे और हर क्षण खुश रहेंगे। मनुष्य भव मिला है तो आनंद की अनुभूति करनी चाहिए और नरक जाना हो तो दुःख को अंगीकार करना चाहिए।

श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर, शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से आयोजित कार्यक्रम में भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने कहा कि सभी लोग सुख के लिए रोते हैं, लेकिन जो दुःख मिल रहे हैं, उन्हें अभी भोग लेना चाहिए, क्योंकि अभी बुद्धि, ज्ञान और विवेक हमारे पास है। यदि तिर्यंच में चले गए तो उन्हें झेलना बहुत पीड़ाकारी होगा।

उन्होंने कहा कि हमारी आत्मा अनंत शक्तियों का पिंड है और ‘जीवंत’ नाम की शक्ति से हम जीवित हैं। विषय-भोग एवं भोजन सुख देते हैं, लेकिन जीवन नहीं देते। हम अपनी शक्ति से जीवित हैं। शक्ति दो प्रकार की होती है—सुप्त और जागृत। ज्ञान नाम की शक्ति को जागृत करना है। सम्यक दृष्टि जीव जानता है कि वह किससे जीवित है, जबकि मिथ्या दृष्टि को लगता है कि वह परिग्रह, दौलत और भोजन से जीवित है। हमारे अंदर ‘जीवंत’ नाम की शक्ति अनंत काल से है, इसलिए आत्मा अजर-अमर है। सिद्ध भगवान अजर-अमर और अविनाशी होते हैं। तीर्थंकर के पास सर्वश्रेष्ठ दर्शन शक्ति होने से वह पूरे विश्व को देखते हैं।

आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति को सुख-दुःख दोनों की अनुभूति होती है। इसे शरीर नहीं, बल्कि आत्मा महसूस करती है। चेतना शक्ति समाप्त नहीं होती, बल्कि कम-ज्यादा होती है। हमारे कर्म हमारे ज्ञान और बुद्धि को हर लेते हैं, जिससे चार गतियों में जन्म-मरण होता रहता है। जिसकी बुद्धि हर ली जाती है, वह सबसे पहले मंदिर जाना, पूजा करना तथा धर्म और सत्संग छोड़ता है। आत्मा की बुद्धि खराब रही तो अनिष्ट गति मिलेगी और भव भ्रमण जारी रहेगा। अनंत सुख हमारे भीतर है, लेकिन बुद्धि खराब रही तो सुख की बजाय दुःख की अनुभूति होगी। भगवान के पास जाकर दुःख नहीं, सुख का अनुभव करना चाहिए। हम जैसा अनुभव करेंगे, वैसा ही प्राप्त होगा। दुःख से कर्म बंध अधिक होते हैं।

श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि आचार्य पुलकसागर महाराज के सानिध्य में पर्युषण (दशलक्षण) पर्व की साधना 16 से 25 सितम्बर तक सूर्यमहल में होगी। इस अवधि में दस दिवसीय पाप नाशनम शिविर का भी आयोजन किया जाएगा। शिविर के माध्यम से पापों का नाश कर कर्म निर्जरा कैसे हो सकती है, इस बारे में आचार्यश्री ज्ञान प्रदान करेंगे। इस विशेष शिविर को लेकर श्रावक-श्राविकाओं में उत्साह का माहौल है।



प्रवचन के प्रारंभ में दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य मंजूदेवी, दीपक अभिषेक पाटनी परिवार ने प्राप्त किया। चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि प्रतिदिन चातुर्मासिक प्रवचन सुबह 8.30 से 10 बजे तक सूर्यमहल में हो रहे हैं। शाम 7 से 8 बजे तक आनंद यात्रा एवं आरती का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर लाभ प्राप्त कर रहे हैं। पर्युषण पर्व की साधना और पाप नाशनम शिविर के आयोजन से चातुर्मास कार्यक्रम में धार्मिक साधना और प्रवचनों का क्रम आगे भी जारी रहेगा।

Rajesh Toshniwal, Bhilwara

Rajesh Toshniwal, Bhilwara

नाम: राजेश तोषनीवाल

वर्तमान पद: ब्यूरो चीफ (भीलवाड़ा)

कार्यक्षेत्र: भीलवाड़ा (राजस्थान)

बीट (मुख्य विषय): राजनीति, क्राइम, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य और बिज़नेस

परिचय 

राजेश तोषनीवाल राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के वरिष्ठ पत्रकार और ब्यूरो चीफ हैं। वह राजनीति, अपराध (क्राइम), स्थानीय प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक गतिविधियों (बिज़नेस) सहित सभी मुख्य विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग करते हैं। मौके पर पहुंचकर सक्रियता से ग्राउंड रिपोर्टिंग करना उनकी मुख्य विशेषता है।

पत्रकारिता का अनुभव (Work Experience)

राजेश तोषनीवाल को पत्रकारिता के क्षेत्र में कुल 44 वर्षों का व्यापक अनुभव है।

  • वह पिछले 35 वर्षों से अधिक समय से 'प्रातःकाल' समाचार पत्र से निरंतर जुड़े हुए हैं।
  • इससे पूर्व उन्होंने 'दैनिक जागरण', 'नवभारत टाइम्स' सहित कई अन्य लोकल एवं राज्यस्तरीय मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं।

शैक्षणिक योग्यता (Education)

  • स्नातक (Graduate)
  • डिप्लोमा इन जर्नलिज्म (Diploma in Journalism)

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