भीलवाड़ा में उमड़ा राष्ट्रभक्ति का सैलाब: 78वें वन सेना दिवस पर "सैन्य आराधना" ने झकझोरी रूह, कवियों की हुंकार से गूंजा महाराणा प्रताप सभागार
भीलवाड़ा के महाराणा प्रताप सभागार में 78वें वन सेना दिवस पर आयोजित "सैन्य आराधना" काव्य संध्या में उमड़ा देशभक्ति का ज्वार। शशिकांत यादव, शिवकुमार व्यास और आयुषी राखेचा जैसे दिग्गज कवियों ने अपनी रचनाओं से सैनिकों के त्याग और शौर्य को किया नमन। सतत सेवा संस्थान के इस भव्य आयोजन में संतों और गणमान्य नागरिकों ने दी उपस्थिति। राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत एक विस्तृत कवरेज।

भीलवाड़ा। वस्त्र नगरी भीलवाड़ा के महाराणा प्रताप सभागार में बीते दिन इतिहास और भावनाओं का एक अनूठा संगम देखने को मिला, जब 78वें वन सेना दिवस के उपलक्ष्य में सतत सेवा संस्थान द्वारा आयोजित "सैन्य आराधना" काव्य संध्या ने उपस्थित जनसमूह की धमनियों में देशभक्ति का संचार कर दिया। सीमाओं पर प्रहरी बनकर डटे वीर जवानों के शौर्य और उनके परिजनों के त्याग को समर्पित यह शाम केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा में समर्पित हर उस वर्दीधारी के प्रति एक भावनात्मक कृतज्ञता थी। कार्यक्रम की शुरुआत मां भारती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन से हुई, जिसके बाद कवियों की ओजस्वी वाणी ने श्रोताओं को अंत तक बांधे रखा।
देश के कोने-कोने से पधारे प्रख्यात हस्ताक्षर इस ऐतिहासिक शाम के साक्षी बने। देवास, मध्य प्रदेश से आए सुप्रसिद्ध कवि शशिकांत यादव ने अपनी कालजयी पंक्तियों "मैं हूं सरहद पै मेरे देश, तेरा हर भाव चंगा हो..." के माध्यम से बलिदान और मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम की जो तस्वीर खींची, उसने पूरे सभागार को भावुक कर दिया। उनके शब्दों में सरहद पर तैनात एक सैनिक की वह पुकार थी जो अपनी व्यक्तिगत खुशियों से ऊपर देश की अस्मिता को रखता है। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए बाराबंकी, उत्तर प्रदेश के कवि शिवकुमार व्यास ने सैनिकों के कठिन जीवन, उनके कठोर अनुशासन और अटूट कर्तव्यनिष्ठा का सजीव चित्रण किया। उनकी पंक्तियां "आंखें सदा लक्ष्य पर रहतीं, पल भर को आराम नहीं..." सीधे हृदय पर चोट करती नजर आईं।
नारी शक्ति और कोमल भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए जोधपुर की कवयित्री आयुषी राखेचा ने सियाचिन जैसे दुर्गम और हाड़ कपा देने वाले क्षेत्रों में तैनात जवानों के संघर्ष को अपनी वाणी दी। उनकी रचना "कोई मौसम कोई रुत हो, या बरसातें सर्दी में..." ने उस असहनीय पीड़ा और साहस को व्यक्त किया, जिसे एक सैनिक शून्य से नीचे के तापमान में भी देश की खातिर सहता है। वहीं नाथद्वारा से आए कवि कानू पंडित ने भी अपनी विशिष्ट शैली में काव्य पाठ कर कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए। कवियों की हुंकार और ओज ने माहौल को इस कदर ऊर्जामय कर दिया कि पूरा सभागार बार-बार तालियों की गड़गड़ाहट और भारत माता के जयकारों से गूंज उठा।
इस गरिमामयी आयोजन में अध्यात्म और समाज सेवा जगत की महान विभूतियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की महत्ता को और बढ़ा दिया। महामंडलेश्वर श्री हंसराम जी (हरि सेवा उदासीन आश्रम), संत श्री मोहन शरण जी (निंबार्क आश्रम), महेंद्र श्री संत दास जी महाराज (हाथीभाटा आश्रम), महेंद्र श्री रामदास जी रामायणी और श्री बृजेंद्र शास्त्री जी (मंशापूर्ण बालाजी पंचवटी) ने अपनी उपस्थिति से मंच को सुशोभित किया। इसके अतिरिक्त भीलवाड़ा के प्रबुद्ध नागरिक, समाजसेवी और साहित्य प्रेमियों ने भी बड़ी संख्या में शिरकत कर सैनिकों के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया।
संस्थान के संस्थापक श्री चंद्रशेखर शर्मा ने आयोजन के अंत में सेवा और राष्ट्र समर्पण की इस मशाल को जलाए रखने का संकल्प दोहराया। उन्होंने काव्य पाठ करने वाले सभी रचनाकारों, मंचासीन अतिथियों और श्रोताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्य ही वह सशक्त माध्यम है जिससे हम नई पीढ़ी में राष्ट्रप्रेम के बीज बो सकते हैं। "सैन्य आराधना" का यह सफल आयोजन न केवल भीलवाड़ा के सांस्कृतिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ गया, बल्कि यह संदेश भी दे गया कि जब तक कलम और तलवार का सम्मान सुरक्षित है, राष्ट्र की सीमाएं भी अभेद्य हैं।

Pratahkal Bureau
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