बोहेड़ा में उमड़ा आस्था का सैलाब: संत दिग्विजय राम ने कहा—'भरोसे की कथा है मायरा, अटूट विश्वास से ही मिलते हैं भगवान'
बोहेड़ा में काबरा परिवार द्वारा आयोजित 'नानी बाई का मायरा' कथा के प्रथम दिन संत दिग्विजय राम जी महाराज ने भक्त नरसी मेहता के जीवन के माध्यम से ईष्ट पर अटूट विश्वास का संदेश दिया। भव्य शोभा यात्रा के साथ शुरू हुई इस कथा में उमड़े सैंकड़ों भक्तों के बीच संत ने बताया कि भगवान भक्तों की परीक्षा प्रतिकूल समय में ही लेते हैं।

बोहेड़ा (23 जनवरी 2026): चित्तौड़गढ़ जिले के बोहेड़ा की गलियां शुक्रवार को उस समय वृंदावन के रंग में रंग गईं, जब राम स्नेही संप्रदाय के सुविख्यात संत दिग्विजय राम जी महाराज के सानिध्य में 'नानी बाई का मायरा' कथा का भव्य शंखनाद हुआ। काबरा परिवार द्वारा आयोजित इस त्रि-दिवसीय आध्यात्मिक अनुष्ठान के प्रथम दिन जनसमूह को संबोधित करते हुए संत दिग्विजय राम ने जीवन में ईष्ट के प्रति अडिग विश्वास की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस नश्वर संसार में व्यक्ति को दुनिया पर नहीं, बल्कि अपने परमात्मा पर अटूट भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि विश्वास की डोर ही भक्त को भगवान से जोड़ती है।
कथा के शुभारंभ से पूर्व ग्राम बोहेड़ा में भक्ति का एक अलौकिक दृश्य देखने को मिला। भगवान चारभुजा नाथ के मंदिर से एक विशाल शोभा यात्रा निकाली गई, जिसमें सैंकड़ों की संख्या में श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए झूमते-नाचते नजर आए। जब यह शोभा यात्रा गांव की प्रमुख गलियों से गुजरी, तो ग्रामीणों ने पुष्प वर्षा कर संत दिग्विजय राम जी का पलक पावड़े बिछाकर स्वागत किया। रथ पर सवार संत का सानिध्य पाकर भक्त भाव-विभोर हो उठे। यह शोभा यात्रा मंदिर से शुरू होकर मुख्य कथा स्थल काबरा गार्डन प्रांगण तक पहुंची, जहाँ वैदिक मंत्रोच्चार और मंगलाचरण के साथ कथा का रसामृतपान शुरू हुआ।
व्यास पीठ से आध्यात्मिक गहराई को साझा करते हुए संत दिग्विजय राम ने कहा कि कथाएं दो प्रकार की होती हैं—पहली भगवान की कथा, जिसे भक्त सुनते हैं, और दूसरी भक्त की कथा, जिसे स्वयं भगवान बड़े चाव से सुनने आते हैं। उन्होंने भक्त नरसी मेहता के जीवन का वृत्तांत सुनाते हुए बताया कि इस कलयुग में केवल प्रेम और अटूट श्रद्धा के वशीभूत होकर भगवान को 52 बार पृथ्वी पर आना पड़ा। संत ने प्रेरणा दी कि जीवन में चाहे कितनी भी प्रतिकूलता आए, भक्त को अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए। उन्होंने उदाहरण दिया कि जिस प्रकार एक कुशल नाविक की परीक्षा विपरीत लहरों में होती है, उसी प्रकार भगवान भी अपने प्रिय भक्त की परीक्षा लेते हैं।
नरसी जी के संघर्षपूर्ण जीवन पर प्रकाश डालते हुए संत ने बताया कि बचपन में वे मूक-बधिर थे, लेकिन संतों की कृपा और महादेव की कठोर तपस्या के फलस्वरूप न केवल उनकी वाणी लौटी, बल्कि उन्हें श्रीकृष्ण के महारास के साक्षात दर्शन भी हुए। कथा के दौरान उन्होंने वह क्षण भी साझा किया जब भगवान कृष्ण ने नरसी जी को केदारा राग का वरदान दिया था। संत दिग्विजय राम ने समाज को संदेश दिया कि सुख-दुख, लाभ-हानि और यश-अपयश सब प्रारब्ध का खेल है, इसलिए व्यक्ति को सांसारिक वस्तुओं के बजाय ईश्वर से केवल भक्ति मांगनी चाहिए। काबरा परिवार द्वारा आयोजित इस गरिमामय कार्यक्रम के प्रथम दिन का समापन भगवान चारभुजा नाथ की आरती और महाप्रसाद वितरण के साथ हुआ, जिसमें पूरे क्षेत्र से आए श्रद्धालुओं ने धर्म लाभ लिया।

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