भीलवाड़ा। धर्मनगरी भीलवाड़ा के हृदय स्थल सांगानेरी गेट के समीप स्थित ऐतिहासिक श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर आज अपनी स्थापना के 473वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। मीरां बाई के कालखंड का यह देवालय न केवल अपनी स्थापत्य कला के लिए विख्यात है, बल्कि इसके साथ जुड़ी अलौकिक मान्यताएं आज भी श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र हैं। जनश्रुतियों और प्राचीन अभिलेखों के अनुसार, यह वही पावन स्थल है जहां प्रथम महंत की अनन्य भक्ति से वशीभूत होकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने साक्षात दूध ग्रहण किया था, जिसके बाद इस मंदिर को 'दूधाधारी गोपाल मंदिर' के नाम से ख्याति प्राप्त हुई।

आज, 23 जनवरी शुक्रवार को इस प्राचीन मंदिर का 473वां पाटोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। उत्सव का शुभारंभ प्रातः 6:15 बजे ठाकुर जी के पंचामृत अभिषेक एवं तुलसी सहस्त्रार्चन के साथ हुआ, जिसके पश्चात प्रभु श्री गोपाल जी और श्री लाड़ली जू का मनमोहक श्रृंगार किया गया। मंदिर के वर्तमान पुजारी पं. कल्याण शर्मा ने बताया कि मंदिर का इतिहास 472 वर्षों का गौरवशाली रिकॉर्ड समेटे हुए है, जिसका प्रमाण प्राचीन बहियों और ताम्रपत्रों में मिलता है। इस मंदिर की स्थापना निंबार्क संप्रदाय की परंपरानुसार प्रथम महंत श्री सुंदर दास जी महाराज ने संवत् 1609 में बसंत पंचमी के दिन अभिजीत मुहूर्त में करवाई थी।

स्थापत्य की दृष्टि से यह मंदिर आधुनिकता और प्राचीनता का अद्भुत संगम है। करीब 5 हजार वर्गफीट में फैले इस मंदिर का नवनिर्मित स्वरूप वृंदावन के प्रसिद्ध 'प्रेम मंदिर' की झलक प्रस्तुत करता है। राजसमंद के श्वेत मार्बल से निर्मित यह दो मंजिला महलनुमा मंदिर 61 फीट ऊंचा है, जिस पर 31 फीट का भव्य शिखर सुशोभित है। उल्लेखनीय है कि मुगल काल के दौरान मंदिर के शिखर को जानबूझकर नहीं बनाया गया था ताकि उसे विध्वंस से बचाया जा सके, और आक्रमण के समय विग्रह की सुरक्षा के लिए उन्हें गुप्त तहखाने में सुरक्षित रखा जाता था। मंदिर की इस नक्काशी को पिंडवाड़ा के करीब 40 कुशल कारीगरों ने मूर्त रूप दिया है।

पाटोत्सव के उपलक्ष्य में आज दोपहर 12:15 बजे भव्य आरती का आयोजन होगा, जिससे पूर्व ठाकुर जी को छप्पन भोग अर्पित किए जाएंगे। यह भीलवाड़ा का वह अनूठा मंदिर है जहां ब्रज की तर्ज पर मल्लखंभ लीला और मटकी फोड़ जैसे आयोजन होते हैं, जो इसे अन्य मंदिरों से विशिष्ट बनाते हैं। 21 जून 2023 को नए महल में विराजने के बाद से ही यहां भक्तों का तांता लगा रहता है, जो आज पाटोत्सव के विशेष फाग कार्यक्रम में भक्ति के रंगों में सराबोर नजर आ रहे हैं। यह मंदिर न केवल एक धार्मिक संरचना है, बल्कि भीलवाड़ा की सांस्कृतिक विरासत और जीवंत आस्था का प्रतीक है।

Pratahkal Bureau

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