अरावली पर उठता आदिवासी आक्रोश: प्रतापगढ़ मिनी सचिवालय में गूंजा विरोध, सांसद राजकुमार रोत बोले—जनसुनवाई के बिना नहीं होगा कोई फैसला
प्रतापगढ़ में अरावली बचाओ अभियान के तहत आदिवासी संगठनों ने मिनी सचिवालय में जोरदार प्रदर्शन किया। सांसद राजकुमार रोत ने सुप्रीम कोर्ट में दी गई अरावली की नई परिभाषा को एकतरफा बताते हुए जनसुनवाई के बिना किसी भी फैसले का विरोध किया और आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी।

प्रतापगढ़। अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर आदिवासी समाज का आक्रोश मंगलवार को प्रतापगढ़ मिनी सचिवालय परिसर में खुलकर सामने आया। अरावली बचाओ अभियान के तहत आदिवासी संगठनों ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए सरकार और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की। बड़ी संख्या में जुटे कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट संदेश दिया कि अरावली से जुड़े किसी भी निर्णय को बिना जनसुनवाई के स्वीकार नहीं किया जाएगा।
भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा, भारत आदिवासी पार्टी सहित कई सामाजिक संगठनों के नेतृत्व में हुए इस प्रदर्शन में आदिवासी समाज के प्रतिनिधि और पदाधिकारी मौजूद रहे। प्रदर्शनकारियों ने मिनी सचिवालय में अधिकारियों को नीचे बुलाने की मांग की और परिसर के भीतर ही धरने पर बैठ गए। आंदोलनकारियों का आरोप था कि जब भी वे अपनी समस्याओं और मांगों को लेकर ज्ञापन देने पहुंचते हैं, जिला कलेक्टर की अनुपस्थिति के कारण उनकी आवाज को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है।
इस विरोध प्रदर्शन को उस समय और बल मिला, जब डूंगरपुर सांसद राजकुमार रोत विशेष रूप से मौके पर पहुंचे। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि अरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ों का समूह नहीं, बल्कि आदिवासी अंचल में जल, जंगल और जमीन की जीवनरेखा है। अरावली का संरक्षण पूरे क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन और आदिवासी समाज के भविष्य से सीधे जुड़ा हुआ है।
सांसद रोत ने सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की सिफारिश पर प्रस्तुत अरावली की नई परिभाषा पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि इस परिभाषा को तय करते समय न तो स्थानीय निवासियों से और न ही सामाजिक संगठनों से कोई परामर्श किया गया। राज्य सरकार की समिति के ड्राफ्ट के अनुसार केवल 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों को ही अरावली माना जाएगा, जबकि इससे कम ऊंचाई वाले हिस्सों को बाहर कर वहां खनन की अनुमति देने का रास्ता खोला जा रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि इस नई परिभाषा के पीछे बड़े उद्योग समूहों के हित साधने की मंशा है। अरावली क्षेत्र में लिथियम और बॉक्साइट जैसे महत्वपूर्ण खनिज संसाधन मौजूद हैं। यदि खनन को अनुमति दी गई तो इससे पर्यावरणीय असंतुलन पैदा होगा और आदिवासी क्षेत्रों में जलस्रोत, जंगल तथा कृषि भूमि को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।
प्रदर्शन के दौरान सांसद राजकुमार रोत के नेतृत्व में आंदोलनकारियों ने एसडीएम को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत अरावली की नई परिभाषा को निरस्त कराने, पूरे मामले की पुनः समीक्षा के लिए नई समिति गठित करने और किसी भी निर्णय से पहले क्षेत्रवासियों की जनसुनवाई सुनिश्चित करने की मांग की गई।
आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार और प्रशासन ने उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले दिनों में उदयपुर संभाग मुख्यालय पर विशाल रैली आयोजित कर सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा। अरावली के संरक्षण को लेकर उठा यह आंदोलन अब केवल प्रतापगढ़ तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी अंचल की सामूहिक चेतना का प्रतीक बनता नजर आ रहा है।
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