भुसावर का रहस्यमयी काला पहाड़: क्या आज भी इस गुफा में मौजूद है द्वारिका जाने का गुप्त रास्ता?
भरतपुर के भुसावर में स्थित काला पहाड़ और धनेरी गुफा का रहस्य आज भी अनसुलझा है। जानिए कैसे महाराजा विजेन्द्रसिंह ने सवा सौ मन तेल जलाकर गुफा का सच जानना चाहा और क्यों इसे गोवर्धन पर्वत का छोटा भाई कहा जाता है। श्रीकृष्ण के द्वारिका प्रस्थान और जरासंध की अग्नि से जुड़े इस रोमांचक इतिहास और पथैना गांव की पौराणिक गाथा को विस्तार से पढ़ें।

भुसावर का रहस्यमयी काला पहाड़: क्या आज भी इस गुफा में मौजूद है द्वारिका जाने का गुप्त रास्ता?
भुसावर (भरतपुर)। राजस्थान के भरतपुर, अलवर और दौसा जिले की सीमाओं के संगम पर स्थित भुसावर उपखंड का गांव पथैना इन दिनों अपनी एक पौराणिक और रहस्यमयी विरासत को लेकर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यहाँ स्थित 'काला पहाड़', जिसे साक्षात गोवर्धन पर्वत का लघु भ्राता माना जाता है, अपने भीतर द्वापर युग के उन अनकहे रहस्यों को समेटे हुए है, जिनका संबंध स्वयं भगवान श्रीकृष्ण और बलराम से है। पथैना गांव से महज दो किलोमीटर दूर इस पहाड़ की तलहटी में स्थित 'श्री धनेरी गुफा वाले हनुमान' का मंदिर न केवल श्रद्धा का सैलाब उमड़ता है, बल्कि उन ऐतिहासिक गाथाओं की गवाही देता है जहाँ आज भी हिंसक वन्यजीवों, मयूरों और वानरों का निर्भय बसेरा है।
लोक मान्यताओं और क्षेत्रीय बुजुर्गों के अनुसार, यह काला पहाड़ ब्रज की अमूल्य धरोहर है। कहा जाता है कि जब कंस वध के पश्चात मगध नरेश जरासंध ने मथुरा पर बार-बार आक्रमण किए, तब श्रीकृष्ण और बलराम ने हलैना के समीप वनखण्डी आश्रम में गहन मंत्रणा की थी। चूंकि जरासंध की मृत्यु उनके हाथों निश्चित नहीं थी, इसलिए यादव सेना के साथ द्वारिका प्रस्थान का निर्णय लिया गया। जनश्रुति है कि विश्वकर्मा द्वारा निर्मित इसी धनेरी गुफा के गुप्त मार्ग से भगवान ने द्वारिका की ओर प्रस्थान किया था। जरासंध को भ्रम हुआ कि दोनों भाई सेना सहित गुफा में छिपे हैं, जिसके चलते उसने गुफा के द्वार पर भीषण आग लगवा दी। मान्यता है कि उस अग्नि की प्रचंडता से ही यह पर्वत झुलसकर काला पड़ गया, जिसे आज दुनिया 'काला पहाड़' के नाम से जानती है।
इस रहस्य की परतें खोलने की कोशिश भरतपुर रियासत के तत्कालीन महाराजा विजेन्द्रसिंह ने वर्ष 1946-47 में की थी। पथैना निवासी सत्येन्द्रसिंह और शिवओम गुप्ता बताते हैं कि जब महाराजा को ग्रामीणों ने बताया कि गुफा के भीतर से रात्रि में झालर-घंटों और विचित्र आवाजें सुनाई देती हैं, तो उन्होंने इसका रहस्य जानने का बीड़ा उठाया। महाराजा के आदेश पर सवा सौ मन सरसों का तेल एकत्र कर विशाल मशालें जलाई गईं। रियासत के जांबाज सैनिकों और कुछ ग्रामीणों का दल इन मशालों के साथ गुफा के भीतर प्रविष्ट हुआ, लेकिन नियति का खेल ऐसा रहा कि जो लोग उस रहस्यमयी अंधेरे में उतरे, वे फिर कभी वापस लौटकर नहीं आए। इस खौफनाक घटना के बाद सुरक्षा की दृष्टि से ग्रामीणों ने गुफा के मुख्य द्वार को दीवार चुनवाकर बंद कर दिया।
आज भी पूर्णिमा और अमावस्या के अवसर पर राजस्थान सहित अन्य राज्यों से भारी संख्या में श्रद्धालु यहाँ परिक्रमा देने आते हैं। पूर्व प्रधान ठाकुर भूपेंद्र सिंह, रॉकी उर्फ राकेश, कौशल फौजदार, सूबेदार मेजर हरभजन सिंह और दिगंबर फौजी जैसे स्थानीय प्रबुद्ध जन बताते हैं कि यह स्थान आज भी उतनी ही आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र है। भक्त अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने पर यहाँ 'गोठ' (सामूहिक भोज) का आयोजन करते हैं। हालांकि गुफा का द्वार बंद है, लेकिन वहां स्थापित प्राचीन हनुमान प्रतिमा और पहाड़ का काला रंग आज भी उस पौराणिक घटना की जीवंत साक्ष्य प्रस्तुत करता है, जिसने सदियों से विज्ञान और विश्वास के बीच एक महीन रेखा खींच रखी है।

Pratahkal Bureau
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