भरतपुर: सुभाष नगर में श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़
व्यासपीठ से पंडित मनोज ने अजामिल उद्धार और नृसिंह अवतार प्रसंग सुनाए, यजमान अशोक सैंगर और कृष्णलता रानी ने सपरिवार हवन यज्ञ में दी आहुतियां।

भरतपुर के सुभाष नगर स्थित नेकी दरबार वाली गली में आयोजित संगीतमयी श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह के तीसरे दिन श्रद्धालु भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के अद्भुत संगम में पूरी तरह सराबोर नजर आए। व्यासपीठ से कथा वाचन करते हुए विख्यात भागवताचार्य पंडित मनोज ने भगवान की विविध लीलाओं और भक्तों की अटूट आस्था का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया, जिससे संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया।
कथा के तीसरे दिन के प्रमुख प्रसंगों में अजामिल उद्धार का मार्मिक चित्रण किया गया। आचार्य ने विस्तार से बताया कि किस प्रकार पापमय जीवन व्यतीत करने वाला अजामिल अपने अंत समय में केवल अपने पुत्र का नाम लेते हुए "नारायण" पुकारता है और मात्र भगवान के नाम के प्रभाव से यमदूतों के पाश से मुक्त होकर विष्णुदूतों द्वारा परम पद को प्राप्त करता है। इस प्रसंग ने उपस्थित जनसमूह को नाम-स्मरण की अमोघ महिमा का यह गहरा संदेश दिया कि निष्काम भाव से लिया गया प्रभु का नाम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
इसके पश्चात हिरण्यकशिपु और परम भक्त प्रह्लाद की कथा का हृदयस्पर्शी वर्णन हुआ। आचार्य ने श्रोताओं को बताया कि अत्याचारी हिरण्यकशिपु ने अपने ही पुत्र प्रह्लाद को हरि-भक्ति से विमुख करने के लिए अनगिनत यातनाएं दीं, परंतु प्रह्लाद की अडिग श्रद्धा रंच मात्र भी विचलित नहीं हुई। अंततः भगवान ने नृसिंह अवतार धारण कर खंभे को चीरते हुए प्रकट होकर भक्त की रक्षा की और अधर्म का समूल नाश किया। यह प्रसंग इस सत्य को प्रतिपादित करता है कि सच्ची और अनन्य भक्ति के समक्ष संसार की कोई भी विपत्ति अधिक समय तक टिक नहीं सकती।
दिव्य कथा के प्रवाह में गजेंद्र मोक्ष के प्रसंग को सुनाते हुए आचार्य ने कहा कि जब जीव अहंकार त्यागकर सच्चे मन से करुण पुकार लगाता है, तो प्रभु स्वयं उसकी रक्षा हेतु तत्पर हो उठते हैं। गजेंद्र की आर्त पुकार और भगवान की असीम दयालुता का यह वृत्तांत सुनकर पांडाल में उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए। इसी क्रम में समुद्र मंथन का अलौकिक प्रसंग भी विस्तार से सुनाया गया, जिसमें देव-दानवों के सहयोग, अमृत प्राप्ति और भगवान की मोहनी लीला का वर्णन किया गया। आचार्य ने इसे मानव जीवन के संघर्ष और धैर्य का प्रतीक बताते हुए कहा कि विषम परिस्थितियों के मंथन से ही अमृत रूपी सफलता का उदय होता है।
कथा के दौरान वामन अवतार का भी भावपूर्ण वर्णन हुआ, जिसमें प्रभु ने लघु रूप धरकर राजा बलि के अहंकार का मर्दन किया और धर्म की पुनर्स्थापना की। इस प्रसंग के माध्यम से समाज को दान, विनम्रता और पूर्ण समर्पण का महत्वपूर्ण संदेश दिया गया। इस अवसर पर वामन भगवान की मनमोहक जीवंत झांकी का प्रदर्शन किया गया, जिसने भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। भजनों की मधुर प्रस्तुति और संगीत की लहरियों पर श्रद्धालु झूमते-गाते हुए भगवान की भक्ति में आकंठ डूबे नजर आए।
मुख्य कथा से पूर्व पंडित सुशील कुमार द्वारा विधिवत हवन संपन्न कराया गया। उन्होंने शास्त्रोक्त वेद मंत्रों के ओजस्वी उच्चारण के साथ मुख्य यजमान परीक्षित दंपत्ति अशोक सैंगर एवं कृष्णलता रानी सहित अन्य उपस्थित भक्तों से हवन यज्ञ में पूर्ण श्रद्धा के साथ आहुतियां दिलवाईं। अंत में आचार्य ने सामूहिक उद्बोधन में कहा कि श्रीमद्भागवत कथा केवल एक धार्मिक कथा मात्र नहीं है, अपितु यह भटकते हुए जीवन को सही दिशा दिखाने वाला एक दिव्य मार्ग है। इसके श्रवण मात्र से अंतःकरण शुद्ध होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में क्षेत्रीय श्रद्धालुओं ने उपस्थिति दर्ज कराकर पुण्य लाभ अर्जित किया।

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