शहीद रमेश स्वामी बलिदान दिवस: भुसावर में युवाओं ने ली आजादी की शपथ
5 फरवरी 1947 को बेगार प्रथा के विरुद्ध बस के आगे लेटकर प्राण त्यागने वाले क्रांतिकारी रमेश स्वामी की 79वीं पुण्यतिथि पर आयोजित होंगे विविध कार्यक्रम।

भुसावर के बस स्टैंड पर स्थित शहीद रमेश स्वामी स्मारक जहां 5 फरवरी को 79वें बलिदान दिवस पर हवन और पुष्पांजलि अर्पित कर उनके योगदान को याद किया जाएगा।
रमेश स्वामी का बलिदान: युवाओं में जगाई आजादी की क्रांति
शहीद रमेश स्वामी (कुन्दनलाल शर्मा) ने भुसावर की धरा पर बेगार प्रथा एवं ऊंच-नीच का विरोध करते हुए 5 फरवरी 1947 को अपने प्राणों की आहुति दी थी। विदेशी शासक के अंग्रेजी अफसर तथा उनके गुलाम भारतीय कर्मचारियों ने उन्हें बस से रौंद डाला, जिसके बाद उनके मुख से अंतिम शब्द "भारत माता की जय" निकले। उनके इस बलिदान ने युवाओं में विदेशी शासन के प्रति नफरत और देश की आजादी के प्रति गहरा लगाव पैदा कर दिया।
महान शिक्षाविद् एवं आर्य समाज के प्रचारक
- शहीद स्वामी आर्य समाज के विश्व विख्यात प्रचारक थे।
- उन्होंने तत्कालीन 100 से अधिक रियासतों, वर्तमान के 20 प्रान्तों और एक दर्जन से अधिक देशों की यात्रा की।
- स्वामी जी ने 200 से अधिक आर्य समाज की इकाइयां गठित कीं।
- उनके शिष्यों में विदेशी लोग और कई देशों के शासक भी शामिल थे।
- वे स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस के विचारों के अत्यंत निकट थे।
79वां बलिदान दिवस और भव्य आयोजन
5 फरवरी 2026 को शहीद रमेश स्वामी का 79वां बलिदान दिवस भुसावर सहित पूरे जिले में मनाया जाएगा।
- स्थान: रमेश स्वामी पार्क, सेठ रघुनाथ प्रसाद उद्यान, राजकीय व गैर राजकीय शिक्षण संस्थान।
- कार्यक्रम: हवन, गोष्ठी और श्रद्धांजलि सभा।
- तैयारी: नगर पालिका भुसावर, प्रशासन, उनके परिजन और विचारक इस कार्य में जुटे हुए हैं।
महिला शिक्षा और सामाजिक सुधार के पक्षधर
स्वामी जी बचपन से ही महिला शिक्षा के समर्थक थे।
- उन्होंने सेठ रघुनाथ प्रसाद मित्तल को प्रेरित किया, जिन्होंने 1946 में "आर्य महिला विद्यापीठ" की स्थापना की।
- मित्तल जी ने 52 बीघा भूमि, एक विश्राम घर, खेडलीगंज की दो दुकानें और नगदी दान की।
- विरोध: बेगार प्रथा, कन्या हत्या, निरक्षरता, छुआछूत, मूर्ति पूजा, अंधविश्वास, पर्दाप्रथा, बाल विवाह, दहेज प्रथा, और अमीर-गरीब का भेदभाव।
- समर्थन: आजादी, महिला शिक्षा, मानव सेवा, हिंदू धर्म प्रचार, मूक-बधिर सेवा और पर्यावरण शुद्धता।
शहीद रमेश स्वामी की जीवनी
शहीद स्वामी का जन्म 1904 में भुसावर के एक साधारण परिवार में जुगलकिशोर शर्मा और गुलाबकोर के घर हुआ। उनका बचपन का नाम कुन्दनलाल शर्मा था।
- परिवार: उनके परिजन आम-नींबू की बागवानी, खेती और पशुपालन करते थे।
- शिक्षा: स्थानीय राजकीय स्कूल से मैट्रिक।
- विवाह: 21 साल की आयु में वैर निवासी पीतम कोर से हुआ; उनके एक पुत्र और दो पुत्रियां थीं।
- रूपांतरण: 1918 में आर्य समाज की सदस्यता ली और 1924 में 'स्वामी' की उपाधि मिलने पर नाम रमेश स्वामी हुआ।
वह हृदयविदारक घटना: जब बस चालक रो पड़ा
5 फरवरी 1947 को स्वामी जी वैर में आंदोलनकारियों की बैठक में जाने के लिए बस स्टैंड पर खड़े थे।
"जैसे ही वे बस में चढ़े, अंग्रेजी अफसर और गुलाम कर्मचारियों ने विरोध किया। स्वामी जी बस के आगे लेट गए। अंग्रेज अफसर ने चालक की गर्दन पर रिवाल्वर तानकर बस चलाने का आदेश दिया। दबाव में आकर चालक ने बस चला दी, जिससे स्वामी जी कुचल गए। इस हादसे के बाद चालक ने रोते हुए पद से त्याग दे दिया और संन्यास ले लिया।"
अंग्रेज अफसरों में स्वामी का खौफ
रमेश स्वामी, रघुनाथ प्रसाद मित्तल और हजारीलाल गर्ग अंग्रेज अफसरों को देख क्रोधित हो जाते थे।
"एक बार कुण्डा के पास एक अंग्रेज अफसर को रोककर इन्होंने उसे मुर्गा बनाया और 'भारत माता की जय' बुलवाई। अफसर द्वारा माफी मांगने और दोबारा भुसावर न आने की सौगंध लेने पर ही उसे छोड़ा गया।"
बलिदान का परिणाम: बेगार प्रथा का अंत
पूर्व सरपंच सतीश पाण्डेय के अनुसार, भुसावर के लोग इस घटना को आज तक नहीं भूले हैं। शहीद स्वामी के बलिदान के बाद हुए बड़े आंदोलन ने बेगार प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। पहले विदेशी शासक भरतपुर के घना में मनोरंजन के लिए भोले-भाले लोगों को लालच देकर ले जाते थे, जहाँ वे कौआ उड़वाते थे और शासक उनका शिकार करते थे।

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