बाणगंगा नदी में धड़ल्ले से हो रहा अवैध रेती खनन, अस्तित्व पर मंडराया संकट; प्रशासन अब जागा
भुसावर के हिंगोटा और झालाटाला क्षेत्र में बाणगंगा नदी से बीते एक वर्ष से अवैध रेती खनन धड़ल्ले से जारी है। जेसीबी और ट्रैक्टरों से प्रतिदिन सौ से अधिक ट्रॉली मिट्टी निकाले जाने से नदी का स्वरूप बिगड़ रहा है और सौ फीट गहरी खाइयां बन गई हैं। शिकायतों के बाद मामला अब प्रशासन और राजस्व विभाग के संज्ञान में आया है।

भुसावर। “अर्जुन की गंगा” के नाम से प्रसिद्ध बाणगंगा नदी इन दिनों अनियंत्रित अवैध खनन की मार झेल रही है। हिंगोटा और झालाटाला गांव के बीच एनएच-21 से महज 200 मीटर की दूरी पर प्रतिदिन सौ से अधिक ट्रॉलियों में रेती और मिट्टी का अवैध दोहन खुलेआम जारी है। जेसीबी मशीनों और ट्रैक्टरों के दम पर नदी के पेट को दिन-प्रतिदिन खोखला किया जा रहा है, जिससे नदी का प्राकृतिक स्वरूप न सिर्फ बिगड़ रहा है बल्कि उसका अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है।
वन विभाग कार्यालय हलेना से मात्र चार किलोमीटर की दूरी पर इतनी बड़ी मात्रा में अवैध खनन होने के बावजूद किसी भी विभाग की सक्रियता नज़र नहीं आ रही। स्थानीय लोगों के अनुसार यह अवैध कारोबार लगभग एक वर्ष से लगातार जारी है। हालात यह हैं कि नदी का प्रवाह क्षेत्र अब बीहड़ का रूप ले चुका है और जगह-जगह सौ फीट से अधिक गहरी खाइयां बन गई हैं। ट्रैक्टरों की आवाजाही छिपाने के लिए रात के अंधेरे में जाल लगा दिया जाता है और रेती से भरी ट्रॉली 100 रुपये में भरवाकर 400 रुपये तक बेची जा रही है।
प्रवाह क्षेत्र से सटे खेतों के किसान सबसे अधिक प्रभावित हैं। उनका कहना है कि बरसात के दौरान तेज बहाव और लगातार कटाव के कारण उनकी भूमि हर वर्ष नदी में समाती जा रही है। प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने का खतरा भी अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है, लेकिन शिकायतों के बावजूद प्रशासन की ओर से कोई प्रभावी कदम अभी तक नहीं उठाया गया।
अवैध खनन की सूचना सामने आने पर हलेना के तहसीलदार मनोज भारद्वाज ने कहा कि यदि नदी प्रवाह क्षेत्र में मिट्टी का दोहन किया जा रहा है तो यह पूर्णत: अवैध है। मामला अब संज्ञान में आ गया है और संबंधित पटवारी से रिपोर्ट लेकर विधिसम्मत कार्रवाई की जाएगी।
इसी बीच वन विभाग से रेंजर राजेश शर्मा ने स्पष्ट किया कि नदी प्रवाह क्षेत्र से किसी भी प्रकार का खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है और रेती या मिट्टी के लिए कोई वैध लीज जारी नहीं होती। उन्होंने बताया कि जिस क्षेत्र का उल्लेख किया जा रहा है वह विरल वन क्षेत्र होने के कारण वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, इसलिए इस पर कार्रवाई की प्राथमिक जिम्मेदारी राजस्व विभाग की है।
बाणगंगा जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व वाली नदी के अस्तित्व पर मंडराते इस संकट ने प्रशासनिक लापरवाही और अवैध खनन माफिया की सक्रियता को उजागर कर दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बढ़ते दबाव और शिकायतों के बाद प्रशासन कितनी तत्परता से इस गंभीर मामले पर ठोस कार्रवाई करता है।
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