डीग की पीली क्रांति: सरसों की खुशबू से महकेंगे खेत, 'एक जिला-एक उपज' योजना से किसानों की बदलेगी तकदीर
डीग जिले में 'एक जिला-एक उपज' योजना के तहत सरसों उत्पादन पर ब्लॉक स्तरीय तकनीकी कार्यशाला का आयोजन। संयुक्त निदेशक रामकुंवर जाट ने 1.10 लाख हेक्टेयर में बुवाई और 41% तेल मात्रा के साथ डीग की सशक्त उपस्थिति पर प्रकाश डाला। जानिए कैसे सरसों बन रही है डीग की आर्थिक रीढ़ और किसानों की आय बढ़ाने का जरिया।

डीग, 09 जनवरी। पूर्वी राजस्थान के कृषि मानचित्र पर अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले डीग जिले में सुनहरी क्रांति की नई इबारत लिखी जा रही है। राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'एक जिला-एक उपज' और पंच गौरव अभियान के तहत शुक्रवार को डीग में आयोजित ब्लॉक स्तरीय तकनीकी कार्यशाला ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरसों केवल एक फसल नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ बन चुकी है। कृषि विभाग द्वारा आयोजित इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी में जिले के रबी क्षेत्र के 85 प्रतिशत भू-भाग पर लहलहाती सरसों की फसल के वैज्ञानिक और आर्थिक पहलुओं पर गहराई से मंथन किया गया।
कार्यशाला का शुभारंभ करते हुए कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक रामकुंवर जाट ने जिले के कृषि परिदृश्य की एक उत्साहजनक तस्वीर प्रस्तुत की। उन्होंने आधिकारिक आंकड़ों के हवाले से बताया कि इस चालू रबी सत्र में विभागीय सक्रियता और उन्नत कृषक चेतना के परिणामस्वरूप 1 लाख 10 हजार हेक्टेयर के विशाल क्षेत्र में सरसों की बुवाई का लक्ष्य सफलतापूर्वक हासिल किया गया है। यह आंकड़ा न केवल जिले के फसल चक्र में सरसों के एकाधिकार को प्रमाणित करता है, बल्कि आगामी समय में होने वाली बंपर पैदावार की ओर भी संकेत करता है।
मंथन के दौरान फसल की गुणवत्ता और उत्पादकता के वैज्ञानिक विश्लेषण ने विशेषज्ञों को भी प्रभावित किया। कृषि विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि डीग की मिट्टी और विशिष्ट जलवायु सरसों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यही कारण है कि यहाँ की उपज में तेल की मात्रा 39 से 41 प्रतिशत तक दर्ज की गई है, जो इसे तेल मिलों और औद्योगिक दृष्टिकोण से बेहद कीमती बनाती है। इसके साथ ही, जिले में प्रति हेक्टेयर 1900 किलोग्राम की औसत उपज ने डीग को राज्य स्तर पर एक सशक्त दावेदार के रूप में स्थापित कर दिया है।
संयुक्त निदेशक रामकुंवर जाट ने कार्यशाला में उपस्थित 100 से अधिक प्रगतिशील किसानों को संबोधित करते हुए इसे एक प्रमुख 'कैश क्रॉप' (नकदी फसल) के रूप में विकसित करने की कार्ययोजना साझा की। उन्होंने जोर देकर कहा कि डीग का किसान अब पारंपरिक खेती की सीमाओं को तोड़कर वैज्ञानिक पद्धतियों को अपना रहा है, जिससे न केवल उनकी आय में वृद्धि हो रही है, बल्कि भारत को खाद्य तेलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के राष्ट्रीय मिशन को भी मजबूती मिल रही है। कार्यशाला के तकनीकी सत्र में कृषि वैज्ञानिकों ने पाला, माहू और अन्य कीट-रोगों से बचाव के व्यावहारिक मंत्र दिए, साथ ही संतुलित उर्वरक प्रयोग और मृदा परीक्षण की अनिवार्यता पर भी चर्चा की गई।
कार्यक्रम में कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, सहायक निदेशक, कृषि पर्यवेक्षक और विभिन्न ग्राम पंचायतों के किसान उपस्थित रहे। यह कार्यशाला न केवल ज्ञान के आदान-प्रदान का माध्यम बनी, बल्कि इसने डीग के किसानों में एक नया आत्मविश्वास फूंका है कि उनकी मेहनत और सरकार की 'एक जिला-एक उपज' जैसी नीतियों के समन्वय से जिले की आर्थिक समृद्धि के द्वार खुलेंगे।

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