भगवान विष्णु की आराधना और दान-पुण्य के साथ श्रद्धा से मनाई गई निर्जला एकादशी, मंदिरों में उमड़ा आस्था का सैलाब
भुसावर में निर्जला एकादशी पर श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, हरि सहस्त्रनाम पाठ और दान-पुण्य के बीच श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। जानिए इस पर्व का धार्मिक महत्व।

भुसावर के राधाकृष्ण युगल किशोरजी मंदिर में निर्जला एकादशी के पावन अवसर पर भगवान की पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद वितरित करतीं महिला श्रद्धालु।
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पावन निर्जला एकादशी पर गुरुवार को भुसावर उपखंड सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में श्रद्धा, भक्ति और सनातन परंपराओं का अनुपम संगम देखने को मिला। चार शुभ योगों के दुर्लभ संयोग में श्रद्धालुओं ने भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधानपूर्वक आराधना कर व्रत, पूजा-अर्चना तथा दान-पुण्य के माध्यम से धर्म लाभ अर्जित किया। दिनभर मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही और पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में सराबोर नजर आया।
निर्जला एकादशी के अवसर पर कस्बे के ऐतिहासिक कोठी वाले हनुमानजी मंदिर, हूंकारेश्वर महादेव मंदिर, दाऊजी महाराज मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, चतुर्भुजजी मंदिर, राधाकृष्ण युगल किशोरजी मंदिर तथा भगतराज वाले हनुमानजी मंदिर सहित अनेक देवालयों को विशेष रूप से सजाया गया। शुभ मुहूर्त में रवि योग, सिद्ध योग और शिव योग के संयोग में श्रद्धालुओं ने भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना, मंत्रोच्चार और जप कर सुख-समृद्धि एवं कल्याण की कामना की।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धालुओं ने ठाकुरजी को जल से भरे मटके, पंखा (बिजनी), छाता, फल, वस्त्र एवं मिठाइयों का अर्पण किया। साथ ही जरूरतमंद लोगों को दान देकर पुण्य अर्जित किया गया। मंदिर परिसरों में दिनभर भजन-कीर्तन, सत्संग और हरि सहस्त्रनाम पाठ का आयोजन होता रहा, जिससे वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत हो गया। ढोलक, झांझ और मंजीरों की मधुर थाप पर गूंजते भजनों ने श्रद्धालुओं को भक्ति रस में डुबो दिया।
इस अवसर पर विद्वान पंडित पुष्पेन्द्र मिश्र, राघवेन्द्र शर्मा और रोहित जति ने निर्जला एकादशी के धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि हिंदू धर्म में प्रत्येक एकादशी तिथि का विशेष महत्व है तथा प्रत्येक माह में दो एकादशियां आती हैं। उन्होंने बताया कि सनातन परंपरा में निर्जला एकादशी को सभी व्रतों में सबसे कठिन और अत्यंत फलदायी माना गया है। मान्यता है कि इस दिन बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की आराधना करने से वर्षभर की सभी 24 एकादशियों के व्रत के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इसी कारण इस एकादशी को भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
निर्जला एकादशी के इस पावन पर्व ने भुसावर क्षेत्र में आस्था, सेवा और धर्मपरायणता का अद्भुत संदेश दिया। मंदिरों में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ और दान-पुण्य की परंपरा ने सनातन संस्कृति की जीवंतता को एक बार फिर सशक्त रूप से प्रदर्शित किया।

Pratahkal Bureau
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