भुसावर। हमारे देश की सनातन संस्कृति में अनेकानेक त्यौहार समय-समय पर हिन्दू रीति रिवाज एवं पंचांग के अनुसार धूमधाम एवं हर्षोल्लास पूर्वक मनाएं जाते हैं। उन्हीं त्यौहारों में से गणगौर का त्यौहार राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और ब्रज क्षेत्र का एक मुख्य त्यौहार है। जहां भरतपुर जिले के ऐतिहासिक भुसावर कस्बे में बरसों से चली आ रही गणगौर खेलने की परंपरा का निर्वाहन करते हुए बच्चियों एवं युवतियां और नवविवाहित महिलाएं होली पर्व के दूसरे दिन से ही 16 दिनों तक अनवरत गणगौर खेलना आरम्भ कर देती है।

मंगल गीतों और कलश यात्रा से महका परिवेश

इस दौरान अल सुबह से ही बाग बगीचा, उद्यानों में जाकर अपने-अपने मंगल कलश को सजाती हैं। वहीं मंगल कलश को फूल पत्तीयों से सजाने संवारने के बाद सिर पर धारण कर मंगल गीत "छोटी सी लाडो पार्वती शिव जी की पूजा करती है,,, गौर गौमती ईस्सर पूजें पार्वती,,,, एक लो दो लो सोलह लो,,," सामुहिक मधुर स्वर लहरी में क्षेत्र को गूंजायमान करते गाते हुए एक निश्चित स्थान पर जाकर मिट्टी से बने ईसर शिवजी और माता गौरा पार्वती जी की प्रतिमा (मूर्ति) को हरि दूब पानी में डालकर स्नान कराते हुए महावर, सिन्दूर, मेहन्दी, हरि चूडिया, श्रंगार का सामान करते हैं।

अखंड सौभाग्य और सुयोग्य वर की कामना

वहीं घरों पर एक निश्चित स्थान पर विराजमान किये मिट्टी से बनें भगवान ईस्सर शिव जी और गौरा पार्वती जी को अक्षत, रोली, पुष्प एवं नैवेद्य, मिष्ठान अर्पित करते हुए धूप दीप के साथ सामुहिक आरती कर भगवान से परिवार में सुख-शांति समृद्धि एवं क्षेत्र में खुशहाली की मनोकामनाएं पूर्ण करने की अरदास लगाते हुए कुंवारी कन्याएं, युवतियां भगवान शिव से सुन्दर शुशील वर पाने की प्रार्थना करती है। भुसावर निवासी पुष्पा सैन, चंचल शर्मा, ममता, दीक्षा शर्मा, लक्ष्मी जती ने बताया कि "इस इसी प्रकार 16 दिनों तक अनवरत गणगौर खेलने का क्रम सुबह जारी रहता है जहां ईस्सर शिव और माता पार्वती जी की पूजा अर्चना करने के बाद आगामी सुबह मिलने का वादा करते हुए अपने अपने घरों को लौट जाती है।"

आधुनिक युग में भी कायम है सैकड़ों वर्षों की परंपरा

वहीं दूसरी ओर महिला भक्त मण्डल की सदस्या रैनू सैन, कल्पना मित्तल, अन्तिमा ने बताया कि "विवाहित महिलाएं चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को गणगौर पूजन एवं व्रत रखकर अपने पति की दीर्घायु की कामना करते हैं।" वहीं उन्होंने बताया कि गणगौर खेलने की परम्परा होली पर्व पूर्णिमा के दूसरे दिन चैत्र मास की प्रतिपदा से शुक्ल पक्ष की तृतीया तक 16 दिनों तक अनवरत चलता है। हालांकि समय के साथ-साथ त्यौहारों की रौनक कम हो गई है, लेकिन इन नन्ही मुन्नी बच्चियों एवं युवतियों के सराहनीय प्रयास है जो क्षेत्र में आज भी 16 दिनों तक अनवरत गणगौर खेलने की सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परम्परा को जीवित (कायम) रखे हुए हैं।

Pratahkal Bureau

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