भुसावर। आस्था, श्रद्धा और वात्सल्य के अटूट संगम का प्रतीक 'सकट चौथ' का पावन पर्व मंगलवार को कस्बे सहित संपूर्ण उपखण्ड क्षेत्र में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। अंग्रेजी नववर्ष के प्रथम सप्ताह में माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर आए इस त्यौहार का महत्व इस बार इसलिए भी बढ़ गया क्योंकि यह सर्वार्थ सिद्धि और आयुष्मान योग के दुर्लभ संयोग में मनाया गया। अपनी संतान की सुख-शांति, अटूट समृद्धि और दीर्घायु की मंगलकामना को लेकर माताओं ने दिनभर निर्जला व्रत रखा और भगवान श्री गणेश एवं चौथ माता की विशेष आराधना की।

नगर के हिंडौन सड़क मार्ग स्थित प्राचीन कोठी वाले हनुमानजी मन्दिर परिसर में सुबह से ही उत्सव जैसा माहौल नजर आया। यहाँ स्थापित चौथ माता की प्रतिमा का अलौकिक और मनमोहक श्रृंगार किया गया, जिसके दर्शनों के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। पारंपरिक रंग-बिरंगे परिधानों में सजी महिलाओं ने विधि-विधान पूर्वक पूजा-अर्चना की और माता रानी को सुहाग की सामग्री जैसे कुमकुम, मेहंदी, वस्त्र और आभूषण अर्पित किए। इस दौरान तिल से बने पकवानों और मिष्ठान का विशेष भोग लगाया गया। सामूहिक रूप से कथा श्रवण का दौर चला, जिसमें श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभाव से अपनी हाजिरी लगाई और परिवार की खुशहाली के लिए अरदास की।

धार्मिक मान्यताओं को रेखांकित करते हुए विद्वान पंडितों ने बताया कि यह पर्व न केवल संतान की रक्षा के लिए है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा पौराणिक संदर्भ भी जुड़ा है। मान्यता है कि माघ मास की इसी चतुर्थी को भगवान शिव ने गणेश जी को गजमुख लगाकर पुनर्जीवित किया था, जिसके बाद से ही यह तिथि 'संकष्टी चतुर्थी' के रूप में विख्यात हुई। स्थानीय स्तर पर इसे वक्रकुण्डी चतुर्थी और तिलकुटा चौथ के नाम से भी श्रद्धापूर्वक पुकारा जाता है। जहां करवा चौथ का व्रत पति की दीर्घायु के लिए समर्पित है, वहीं सकट चौथ का कठिन निर्जला व्रत मातृशक्ति द्वारा अपनी संतान के जीवन से संकटों को हरने के संकल्प के साथ किया जाता है।

दिन भर चले भक्तिमय वातावरण के बाद, देर रात्रि को आसमान में जैसे ही चन्द्रमा का उदय हुआ, प्रतीक्षारत महिलाओं ने चंद्रदेव को अर्घ्य देकर अपना उपवास खोला। बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने की परंपरा के साथ इस धार्मिक अनुष्ठान का समापन हुआ। श्रद्धा और लोक परंपराओं का यह संगम दर्शाता है कि आधुनिकता के दौर में भी भुसावर की माटी में सनातन संस्कृति और संस्कारों की जड़ें कितनी गहरी हैं।

Pratahkal Newsroom

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