भरतपुर। राजस्थान के भरतपुर जिले की पहचान अब केवल केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां के खेतों में लहलहाती सरसों की फसल अब 'पीली क्रांति' का नया अध्याय लिख रही है। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी 'राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन (तिलहन)' और राज्य सरकार के 'पंच गौरव' कार्यक्रम के सफल समागम ने भरतपुर को देश की 'सरसों राजधानी' के रूप में नई ऊंचाई प्रदान की है। इस योजना का सीधा असर न केवल खेतों की हरियाली पर दिख रहा है, बल्कि यह घरेलू खाद्य तेल उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते भारत का एक सशक्त प्रतिबिंब बनकर उभरा है।

कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक राधेश्याम मीना ने इस बदलाव की रूपरेखा साझा करते हुए बताया कि जिले में सरसों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए जमीनी स्तर पर व्यापक नवाचार किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की मंशानुरूप, भरतपुर की विशिष्ट पहचान को वैश्विक पटल पर लाने के लिए 'एक जिला-एक उत्पाद' (ODOP) के तहत सरसों को 'पंच गौरव' में शामिल किया गया है। वर्तमान में बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही भरतपुर के विस्तृत भूभाग पर पीली चुनर ओढ़े सरसों के खेत एक मनोरम दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं, जो न केवल पर्यटन बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी बन चुके हैं।

आंकड़ों की जुबानी इस सफलता को समझें तो वर्ष 2024-25 में जहां सरसों की खेती का क्षेत्रफल 1,30,265 हेक्टेयर था, वहीं प्रभावी क्रियान्वयन के चलते वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 1,38,781 हेक्टेयर तक पहुंच गया है। उत्पादकता के मामले में भी जिला नई इबारत लिख रहा है, जहां वर्तमान में 1960 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की उत्पादकता दर्ज की गई है, जिसे विभाग ने अब 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विभाग ने 10 हजार किसानों को 'राधिका' किस्म के 400 क्विंटल प्रमाणित बीज निःशुल्क वितरित किए हैं, साथ ही 30 हजार मिनीकिट और 2,500 खेतों पर फसल प्रदर्शन आयोजित कर किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक से जोड़ा है।

इस पूरी प्रक्रिया में सेवर स्थित राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केंद्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। 20 अक्टूबर 1993 को स्थापित यह संस्थान उन्नत प्रजनन सामग्री और उच्च उपज वाली किस्मों के विकास में निरंतर संलग्न है। इसी शोध का परिणाम है कि भरतपुर आज न केवल कच्चे तेल का उत्पादन कर रहा है, बल्कि यहां की 100 से अधिक ऑयल मिलों से निकलने वाला तेल और पशु आहार (खली) दक्षिण भारत के राज्यों सहित पड़ोसी देशों में भी निर्यात किया जा रहा है। संयुक्त निदेशक राधेश्याम मीना के अनुसार, यह योजना न केवल आयात पर निर्भरता कम करेगी, बल्कि मूल्य श्रृंखला विकास के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक मजबूती भी सुनिश्चित करेगी।

Pratahkal Newsroom

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