भुसावर उपखंड की पहाड़ियों में संचालित क्रेशरों पर मजदूरों की जिंदगी सस्ते श्रम के नाम पर दांव पर लगाई जा रही है। क्रेशर मालिकों की मनमानी और विभागीय लापरवाही का आलम यह है कि मजदूरों से बिना किसी सुरक्षा उपकरण के जोखिमभरा काम कराया जा रहा है। न हेलमेट, न सेफ्टी सूट, न धूल से बचाव के साधन—सिर्फ पत्थरों और धूल के बीच हर दिन मौत के साये में काम करते ये मजदूर अपने परिवार की आजीविका के लिए जान गंवाने तक मजबूर हैं।

अब तक दो दर्जन से अधिक दर्दनाक हादसे इन क्रेशर जोनों में हो चुके हैं, जिनमें कई मजदूर अपनी जान गंवा चुके हैं। फिर भी न तो खनिज विभाग, न प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और न ही राजस्व विभाग इन घटनाओं पर कोई संज्ञान ले रहा है। हर विभाग अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने में लगा है। खनिज विभाग स्टॉक की जांच का हवाला देता है तो प्रदूषण विभाग राजस्व के अधिकार क्षेत्र की बात कहकर मामले को टाल देता है।

मजदूरों का कहना है कि क्रेशर मालिकों द्वारा उन्हें बिना सुरक्षा साधनों के काम पर लगाया जाता है। कई स्थानों पर तो क्रेशर के आसपास पेड़-पौधों की अनुपस्थिति और पानी के छिड़काव की कमी के कारण धूल का गुबार वातावरण को प्रदूषित कर रहा है। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा तय मानकों और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

कुछ वर्ष पहले बल्लभगढ़ निवासी एक मजदूर का हाथ क्रेशर पर काम करते समय कट गया था। विकलांग होने के बाद भी संचालकों ने उसकी कोई सहायता नहीं की। हाल ही में 10 जून को भुसावर थाना क्षेत्र के गांव निठार निवासी प्रभु दयाल जांगिड़ की बांके बिहारी क्रेशर पर हादसे में मौत हो गई। पुलिस ने शव को रातभर मोर्चरी में रखवाया, मगर विवादों के चलते समझौता नहीं हो सका। गरीब परिवार अब सहारे के बिना जीवनयापन करने को मजबूर है।

मजदूरों में सिलिकोसिस जैसी गंभीर बीमारी तेजी से फैल रही है। लगातार धूल और प्रदूषण के संपर्क में रहने के बावजूद उन्हें कोई मुआवजा या उपचार सुविधा नहीं मिलती। किसी की मृत्यु होने पर भी परिजन महीनों तक मुआवजे के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहते हैं।

क्रेशर लीज में गहरी खुदाई के चलते कई बार जानवर और इंसान तक इन खड्डों में गिरकर जान गंवा देते हैं। कुछ क्रेशर तो सड़कों के किनारे बने हैं, जहां ब्लास्टिंग के दौरान किसी भी वक्त बड़ा हादसा हो सकता है। घाटरी क्रेशर जोन में दूषित पानी इकट्ठा कर छोड़ दिया जाता है, जिसमें कई बार जानवर फंसकर मर जाते हैं।

स्थानीय प्रशासन की निष्क्रियता और विभागीय मिलीभगत से यह पूरा तंत्र मजदूरों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि जिन संचालकों के पास सुरक्षा और प्रदूषण नियंत्रण के उपकरण नहीं हैं, उनके खिलाफ तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए ताकि मजदूरों की जान बच सके और उद्योग में सुरक्षा के मानक लागू किए जा सकें।

मजदूरों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें काम पर रखा तो जाता है, लेकिन भुगतान के समय निकाल दिया जाता है। प्रशासन और सरकार के लिए यह स्थिति चेतावनी है कि यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भुसावर के ये क्रेशर मजदूरों के लिए मौत के मैदान बनते रहेंगे।

Pratahkal Bureau

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